स्वामी विवेकानंद की दो पश्चिमी मुलाकातें
जर्मनी के प्रसिद्ध भारतविद मैक्समूलर स्वामी
विवेकानंद से अपनी मुलाकात से पूर्व ही श्री रामकृष्ण देव के नाम से परिचय पा चुके
थे. भारत से प्राप्त सूचनाओं और सामग्री के आधार पर उन्होंने ‘ एक सच्चा महात्मा’
नामक लेख भी श्री रामकृष्ण देव पर लिखा था. स्वामी विवेकानंद की इंग्लैंड यात्रा
के दौरान मैक्समूलर जो उस समय ऑक्सफ़ोर्ड में प्रोफेसर थे, ने स्वामी जी को भोजन का
निमंत्रण दिया और व्यग्रता से उनकी प्रतीक्षा करने लगे. नियत समय पर जब स्वामी विवेकानंद उनसे मिलने
पहुंचे तो वृद्ध और विद्वान प्रोफ़ेसर से मिलकर अत्यंत आनंदित हुए. श्री रामकृष्ण
का प्रसंग उठने पर उन्होंने कहा , “ प्रोफेसर ! आज हजारों लोग श्री रामकृष्ण की
पूजा कर रहें है .” तो मैक्समूलर ने उत्तर दिया, “ यदि लोग ऐसे व्यक्ति की पूजा
नहीं करेंगे तो और किसकी करेंगे. “ बाद
में स्वामी विवेकानंद ने अपनी इस मुलाकात के बारे में बताया कि यह भेंट उनके लिए
बड़ी ही ज्ञानवर्धक थी. सत्तर वर्ष की आयु में भी वे स्थिर, प्रसन्न मुख, बालकों सा
कोमल ललाट, श्वेत चमकते केश, ऋषि के समान अंतर में गंभीर आध्यात्मिक निधि को
संजोये मैक्समूलर और वैसी ही उनकी पत्नी, जैसे उन्हें अरुंधती और वशिष्ठ आदि
ऋषियों के गौरवशाली युग में ले गए.
मैक्समूलर का भारतप्रेम देखकर स्वामी विवेकानंद
अभिभूत हो उठे. उन्होंने पूछा , “ आप भारत कब आ रहें है ? भारतवर्षियों के पूर्वजों की चिंतन राशी को आपने यथार्थ रूप
में लोगों के सामने रखा है, अत: वहां का प्रत्येक हृदय आपका स्वागत करेगा.” तब भाव
विभोर होकर जर्मनी में जन्मे उस प्राचीन भारतीय ऋषि ने कहा, “ तब तो मैं वापस नहीं
आ पाऊंगा; आप लोगों को मेरा दाह संस्कार वहीँ कर देना होगा.” तब स्वामी जी ने इस विषय को वहीं विराम देना
उचित समझा.
मैक्समूलर ने स्वामीजी से पूछा, “ विश्व को श्री
रामकृष्ण से परिचित करने के लिए आप लोग क्या कर रहे हैं ?” और जब स्वामी जी विदा होने लगे तो मैक्स्मूलर
उन्हें छोड़ने रेलवे स्टेशन तक आये. जब स्वामीजी ने इतना कष्ट करने पर आपत्ति जताई,
तो मैक्समूलर का कहना था , “ श्री रामकृष्ण के एक शिष्य के साथ हमारी भेंट
प्रतिदिन तो नहीं होती.”
प्रसिद्ध अज्ञेयवादी रोबर्ट इंगरसोल के साथ
स्वामी विवेकानंद की कई मुलाकातें हुयी. वयोवृद्ध इंगरसोल ने इस उत्साही युवक को
सलाह देते हुए कहा कि यहाँ के लोग धर्म के मामले में अति असहिष्णु है, अत: अपने
विचार व्यक्त करने ज्यादा साहस न दिखाएँ. तत्पश्चात वे बोले, “ यदि चालीस वर्ष
पूर्व आप यहाँ आते तो या तो आपको फांसी पर चढ़ा दिया जाता या जिन्दा जला दिया
जाता.” स्वामी विवेकानंद यह सुनकर विस्मित तो हुए पर शायद रोबर्ट इंगरसोल इस बात
से परिचित नहीं थे कि इस युवा संन्यासी की विचारधारा में किसी धर्म के प्रति अपमान
का भाव नहीं वरन सभी के प्रति सम्मान का ही भाव था. एक वार्तालाप के दौरान इंगरसोल ने स्वामी जी से
कहा, ‘ मेरा विचार है कि इस जगत से जितना संभव हो लाभ उठाने का प्रयत्न करना
चाहिए. संतरे को पूरी तरह निचोड़कर जितना रस निकल सके निकल लेना चाहिए.” विदित हो
कि इंगरसोल ईश्वर, आत्मा, परलोक आदि को कोरी कल्पना मानकर इनमे बिलकुल भी विश्वास
नहीं करते थे. तब स्वामीजी ने कहा, “ इस जगत रुपी संतरे को निचोड़ने की मैं आपसे
कहीं अधिक उत्कृष्ट प्रणाली जानता हूँ और मैं उसमे रस भी अधिक पाता हूँ. मैं जानता
हूँ कि मेरी मृत्यु नहीं है, अत: मुझे रस निचोड़ने की जल्दबाजी नहीं है, मेरे लिए
भय का कोई कारण नहीं है, अत: आनंदपूर्वक निचोड़ता हूँ. मेरा कोई कर्तव्य नहीं, मुझे
स्त्री , पुत्र , संपत्ति आदि का कोई बंधन नहीं, इसलिए मै सभी नर-नारियों से प्रेम
कर सकता हूँ, सभी मेरे लिए ब्रह्म स्वरुप है. मनुष्य को भगवान समझ कर उसके प्रति
प्रेम रखने में कितना आनंद है. संतरे को इस प्रकार निचोड़ कर देखिये और उसमे एक
बूँद भी न बचेगा.”
विख्यात अज्ञेयवादी इंगरसोल ने स्वामी विवेकानंद
से कहा कि “ कृपया मुझ पर नाराज न हो, क्योंकि मैं स्वयं भी प्राचीन रूढ़ियों के विरुद्ध ही संघर्ष
करता आया हूँ और इस प्रकार मैंने अमेरिका में आपके लिए ही पथ प्रशस्त किया है. “