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गुरुवार, जून 16, 2011

सुनो रहीम !


"प्रेम का धागा "


अब कहाँ है


स्वार्थ की डोर से


बंधे हुए रिश्ते


बनते और बिगड़ते हैं


सुविधानुसार


टूट जाते हैं


और फिर जुड़ जाते हैं


बिना किसी गाँठ के !

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