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श्री रामकृष्ण का हास्य बोध -34 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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बुधवार, जनवरी 11, 2012

कमरे में आकर श्री रामकृष्ण अपने आसन पर बैठे। जो लोग संकीर्तन कर रहे थे, उन लोगों ने आकर श्री रामकृष्ण को प्रणाम किया। श्री रामकृष्ण उनसे कह रहे हैं- " रूपये के लिए जिस तरह देह से पसीना बहाते हो, उसी तरह उनका नाम लेकर नाच-कूद कर बहाना चाहिए। मेरी इच्छा हुई तुम लोगो के साथ नाचूँ । जाकर देखा मसाला पड़ चुका था- मेथी तक। ( सब हंसते हैं।) तब मैं क्या डालकर उसे सुगन्धित करता ?

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से