कमरे में आकर श्री रामकृष्ण अपने आसन पर बैठे। जो लोग संकीर्तन कर रहे थे, उन लोगों ने आकर श्री रामकृष्ण को प्रणाम किया। श्री रामकृष्ण उनसे कह रहे हैं- " रूपये के लिए जिस तरह देह से पसीना बहाते हो, उसी तरह उनका नाम लेकर नाच-कूद कर बहाना चाहिए। मेरी इच्छा हुई तुम लोगो के साथ नाचूँ । जाकर देखा मसाला पड़ चुका था- मेथी तक। ( सब हंसते हैं।) तब मैं क्या डालकर उसे सुगन्धित करता ?
- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से
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