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मंगलवार, मार्च 20, 2012

प्रतिक्रिया घटायें।

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आदमी ने दुनिया भर की चीजें बना ली, बस आदमी को आदमी बनाना बाकी रह गया।

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अब प्रश्नों को परे करो, द्वन्द को हटाओ दूर।

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दुःख: और सुख आसमान से नहीं टपकते, इनकी तो यहीं एडवांस बुकिंग होती है। सुख की एडवांस बुकिंग के लिए सत्कर्मों का भुगतान करना होता है, दुःख: की एडवांस बुकिंग के लिए बुरे कर्मों का। खिड़कियाँ दोनों खुली है , निर्णय स्वयं के हाथ में है।

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बुधवार, मार्च 07, 2012

यह मन कितना वेगवान हैं। कितना चंचल हैं। कितना हठी है। कितना अभिमानी है। आकाश की असीम ऊंचाई से पाताल की अटल गहराई तक मन निर्विघ्न, निर्भय विचरण करता है। इसमें सूर्य का प्रचंड प्रकाश भी है तो अमावस्या का घोर तिमिर भी। यह शत्रु हो जाये तो परम दुर्भाग्य। यह मित्र हो जाये तो परम सौभाग्य। यह उन्मत्त हो जाये तो मतवाले हाथियों के झुंड भी सर झुका एक ओर हट जाये। यह शांत हो तो 'बुतों' में हलचल दिखे। ऐसा मेरा, सबका मन शुभ संकल्प से युक्त हो।
- भौतिकता की चाह का तूफान आदमी के सुख चैन को न जाने कहाँ उड़ा ले गया !
जिन्दगी के धोबी घाट पर समय नाम का धोबी मानवरूपी कपड़ों को पटक पटक कर धो रहा है।
कपड़ों ने मैल को बहुत जकड रखा है। पर वह भी पक्का धोबी है। आखिर कपडे कितनी देर अपनी चला पाएंगे। समय उन्हें उज्ज्वल कर ही देगा। बना ही देगा निर्मल ! कूट कूट कर!

मंगलवार, मार्च 06, 2012

श्री रामकृष्ण - ( राम से)- बाजा नहीं है। अगर अच्छा बाजा रहा तो गाना खूब जमता है। ( हँसकर) बलराम का बंदोबस्त , जानते हो ? ब्राह्मण की गौ ! - जो खाय तो कम, पर दूध दे सेरों !' ( सब हँसते हैं।)

-श्रीरामकृष्ण वचनामृत से
श्री रामकृष्ण - ".......... शास्त्रों में उनके पाने के उपायों की ही बातें मिलेगी। परन्तु ख़बरें लेकर काम करना चाहिए। तभी तो वस्तु लाभ होगा। केवल पांडित्य से क्या होगा ? बहुत से श्लोक और बहुत से शास्त्र पंडितों के समझे हुए हो सकते हैं, परन्तु संसार पर जिसकी आसक्ति है, मन ही मन कामिनी और कंचन पर जिसका प्यार है, शास्त्रों पर उसकी धारणा नहीं हुई- उसका पढना व्यर्थ है। पंचांग में लिखा है कि इस साल वर्षा खूब होगी, परन्तु पंचांग को दाबने पर एक बूँद भी पानी नहीं निकलता, भला एक बूँद भी तो गिरता, परन्तु उतना भी नहीं गिरता ! " ( सब हँसते हैं।)


- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से
श्री रामकृष्ण (हँसकर) - केशव सेन ने एक दिन लेक्चर दिया। कहा, ' हे ईश्वर ऐसा करो कि हम लोग भक्ति नदी में गोते लगा सकें और गोते लगा कर सच्चिदानन्दसागर में पहुँच जाएँ।' स्त्रियाँ सब 'चिक' की ओट में बैठी थी। मैंने केशव से कहा, ' एक ही साथ सब आदमियों के गोते लगाने से कैसे होगा ? तो इन लोगों ( स्त्रियों) की दशा क्या होगी ? कभी कभी किनारे लग जाया करना। फिर गोते लगाना, फिर ऊपर आना।' केशव और दूसरे लोग हँसने लगे।

-श्रीरामकृष्ण वचनामृत से
श्री रामकृष्ण - ".........मैंने सब तरह किया है - सब शास्त्रों को मानता हूँ। शाक्तों को भी मानता हूँ और वैष्णवों को भी मानता हूँ। उधर वेदान्त्वादियों को भी मानता हूँ। यहाँ इसीलिए सब मतों के आदमी आया करते हैं। और सब यहीं सोचते हैं की ये हमारे मत के आदमी हैं। आजकल के ब्रह्म समाज वालों को भी मानता हूँ।

एक आदमी के पास एक , रंग का गमला था। उस गमले में एक बड़े आश्चर्य का गुण ये था कि जिस किसी रंग में वह कपडे रंगना चाहता था , उसी रंग में कपडे रंग जाते थे। कोई कहता पीला तो वह उसमे डूबा कर देता - यह लो पीला; कोई कहता नीला तो वह उसमे डूबा कर देता , यह लो नीला।

परन्तु किसी होशियार आदमी ने कहा, तुमने इसमें जो रंग घोला है वहीँ रंग मुझे दो।

( श्री रामकृष्ण और सब हँसते हैं।)

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से