श्री रामकृष्ण - ".........मैंने सब तरह किया है - सब शास्त्रों को मानता हूँ। शाक्तों को भी मानता हूँ और वैष्णवों को भी मानता हूँ। उधर वेदान्त्वादियों को भी मानता हूँ। यहाँ इसीलिए सब मतों के आदमी आया करते हैं। और सब यहीं सोचते हैं की ये हमारे मत के आदमी हैं। आजकल के ब्रह्म समाज वालों को भी मानता हूँ।
एक आदमी के पास एक , रंग का गमला था। उस गमले में एक बड़े आश्चर्य का गुण ये था कि जिस किसी रंग में वह कपडे रंगना चाहता था , उसी रंग में कपडे रंग जाते थे। कोई कहता पीला तो वह उसमे डूबा कर देता - यह लो पीला; कोई कहता नीला तो वह उसमे डूबा कर देता , यह लो नीला।
परन्तु किसी होशियार आदमी ने कहा, तुमने इसमें जो रंग घोला है वहीँ रंग मुझे दो।
( श्री रामकृष्ण और सब हँसते हैं।)
- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से
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