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सोमवार, फ़रवरी 20, 2012

गिरीश - नरेन्द्र कहता है, उनकी संपूर्ण धारणा क्या कभी हो सकती है ? वे अनंत हैं।
श्री रामकृष्ण ( गिरीश से) - ईश्वर की सब धारणा कर भी कौन सकता है ? न उनका कोई बड़ा अंश, न कोई छोटा अंश संपूर्ण धारणा में लाया जा सकता है; और संपूर्ण धारणा करने की जरुरत ही क्या है ? उन्हें प्रत्यक्ष कर लेने ही से काम बन गया। उनके अवतार को देखने से ही उनको देखना हो गया। अगर कोई गंगाजी के पास जाकर गंगा जल का स्पर्श करता है तो वह कहता है, मैं गंगाजी के दर्शन कर आया। उसे हरिद्वार से गंगासागर तक की गंगा का स्पर्श नहीं करना पड़ता। ( सब हँसते हैं।)

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से
पल्टू और विनोद सामने बैठे हुए हैं।

श्री रामकृष्ण (पल्टू से, सहास्य ) - तू ने अपने बाप से क्या कहा ? ( मास्टर से) सुना, इसने यहाँ आने की बात पर अपने बाप को भी जवाब दे दिया। ( पल्टू से) क्यों रे, क्या कहा ?

पल्टू - मैंने कहा, हाँ, मैं उनके पास जाया करता हूँ, तो यह कौनसा बुरा काम है ? ( श्री रामकृष्ण और मास्टर हँसे।) अगर जरुरत होगी तो और भी इसी तरह की सुनाऊंगा।

श्री रामकृष्ण ( सहास्य, मास्टर से) - नहीं, क्यों जी, इतनी भी कहीं, बढा-चढी होती है ?

मास्टर - जी नहीं, इतनी बढा -चढी अच्छी नहीं।

( श्री रामकृष्ण हँसतेहैं।)

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से

शुक्रवार, फ़रवरी 17, 2012

श्रीरामकृष्ण - " केशव एक दिन आया था। रात के 10 बजे तक रहा। प्रताप तथा अन्य किसी ने कहा, ' आज यहीं रहेंगे।' हम सब लोग वट-वृक्ष के नीचे ( पंचवटी में) बैठे थे। केशव ने कहा, ' नहीं, काम है, जाना होगा।'
उस समय मैंने हँसकर कहा , मछली की टोकरी की गंध न होने पर क्या नींद नहीं आयेगी? एक मछली बेचने वाली एक महिला के घर अतिथि बनी थी। मछली बेचकर आ रही थी , साथ में मछली की टोकरी थी। उसे फूल वाले कमरे में सोने को दिया गया। फूलों की गंध से उसे अधिक रात तक नींद नहीं आयी। घरवाली ने उसकी यह दशा देखकर कहा ,' क्यों , तुम छटपटा क्यों रही हो ? ' उसने कहा, ' कौन जाने भाई, इन फूलों की गंध से ही नींद नहीं आ रही है। मेरी मछली की टोकरी जरा ला दो , संभव है नींद आ जाये।' अंत में मछली की टोकरी लायी । उस पर जल छिड़क कर नाक के पास रख ली। फिर खर्राटे के साथ सो गयी ! "
" कहानी सुन कर केशव के दल वाले जोर से हँसने लगे।"

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से

बुधवार, फ़रवरी 08, 2012



यदु बाबु कह रहे हैं, पधारिये , पधारिये। आपस में कुशल प्रश्न के बाद श्रीरामकृष्ण बातचीत कर रहे हैं।

श्री रामकृष्ण ( हँसकर) - तुम इतने चापलूसों को क्यों रखते हो ?

यदु ( हँसते हुए) - इसलिए कि आप उनका उध्दार करें। ( सभी हँसने लगे।)

श्रीरामकृष्ण - चापलूस लोग समझते हैं की बाबू उन्हें खुले हाथ धन देंगे; परन्तु बाबू से धन निकालना बड़ा कठिन काम है । एक सियार एक बैल को देख उसका फिर साथ न छोड़े। बैल चरता फिरता है, सियार भी साथ साथ है। सियार ने समझा कि बैल का जो अंडकोष लटक रहा है, वह कभी न कभी गिरेगा और वह उसे खायेगा! बैल कभी सोता है तो वह भी उसके पास ही लेटकर सो जाता है और फिर जब बैल उठकर घूम-फिर कर चरता है तो वह भी साथ-साथ रहता है। कितने ही दिन इस प्रकार बीते, परन्तु वह कोष नहीं गिरा, तब सियार निराश होकर चला गया ! ( सभी हँसने लगे ।) इन चापलूसों की ऐसी ही दशा है !

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से

मंगलवार, फ़रवरी 07, 2012

....इसी समय गेरुए वस्त्र पहने हुए एक अपरिचित बंगाली सज्जन आ पहुंचे। भक्तों के बीच में बैठ गए।

धीरे धीरे श्रीरामकृष्ण की समाधि छूटने लगी। भाव में आप ही आप बातचीत कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (गेरुआ देखकर ) - " यह गेरुआ क्यों ? क्या कुछ लपेटने से ही हो गया ? ( हँसते हैं।) किसी ने कहा था - ' चंडी छोड़कर अब ढोल बजाता हूँ। 'पहले चंडी के गीत गाता था, फिर ढोल बजाने लगा। ( सब हँसते हैं।)


- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से

सोमवार, फ़रवरी 06, 2012

श्रीरामकृष्ण - मन से सम्पूर्ण त्याग के हुए बिना ईश्वर नहीं मिलते। साधू संचय नहीं कर सकता। कहते हैं, पक्षी और दरवेश , ये दोनों संचय नहीं करते। यहाँ का तो भाव यह है कि हाथ में मिट्टी लगाने के लिए मैं मिट्टी भी नहीं ले जा सकता। पानदान में पान भी नहीं ले जा सकता। हृदय जब मुझे बड़ी तकलीफ दे रहा था, तब मेरी इच्छा हुई, यहाँ से काशी चला जाऊं। सोचा, कपडे तो लूँगा, परन्तु रूपये कैसे लूँगा ? इसीलिए फिर काशी जाना भी नहीं हुआ। ( सब हँसते हैं।)

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से

गुरुवार, फ़रवरी 02, 2012

श्री रामकृष्ण - " ...........मेरी अब वह अवस्था नहीं है। हनुमान ने कहा था - वार, तिथि, नक्षत्र, इतना सब मैं नहीं जानता, मैं तो बस श्रीरामचंद्र जी की चिंता किया करता हूँ। ....राम और लक्ष्मण जब पम्पा सरोवर पर गए, तब लक्ष्मण ने देखा, एक कौआ व्याकुल होकर बार बार पानी पीने के लिए जा रहा था, परन्तु पीता न था। राम से पूछने पर उन्होंने कहा, ' भाई, यह कौआ परम भक्त है। दिन रात यह राम नाम जप रहा है। इधर प्यास के मारे छाती फटी जा रही है, परन्तु सोचता है, पानी पीने लगूंगा तो जप छूट जायेगा।' मैंने पूर्णिमा के दिन हलधारी से पूछा, ' दादा, आज क्या अमावस है ? ' ( सब हंसते हैं।)


(सहास्य) हाँ, यह सत्य है। ज्ञानी पुरुष की पहचान यह है कि पूर्णिमा और अमावस में भेद नहीं पाता। परन्तु हलधारी को इस विषय में कौन समझा सकता था, वो कहता, देखो, ये पूर्णिमा और अमावस में भेद नहीं कर सकते और लोग इनको इतना मानते हैं !


- श्रीरामकृष्ण वचनामृत