श्रीरामकृष्ण - मन से सम्पूर्ण त्याग के हुए बिना ईश्वर नहीं मिलते। साधू संचय नहीं कर सकता। कहते हैं, पक्षी और दरवेश , ये दोनों संचय नहीं करते। यहाँ का तो भाव यह है कि हाथ में मिट्टी लगाने के लिए मैं मिट्टी भी नहीं ले जा सकता। पानदान में पान भी नहीं ले जा सकता। हृदय जब मुझे बड़ी तकलीफ दे रहा था, तब मेरी इच्छा हुई, यहाँ से काशी चला जाऊं। सोचा, कपडे तो लूँगा, परन्तु रूपये कैसे लूँगा ? इसीलिए फिर काशी जाना भी नहीं हुआ। ( सब हँसते हैं।)
- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से
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