यह ब्लॉग खोजें

मंगलवार, फ़रवरी 07, 2012

....इसी समय गेरुए वस्त्र पहने हुए एक अपरिचित बंगाली सज्जन आ पहुंचे। भक्तों के बीच में बैठ गए।

धीरे धीरे श्रीरामकृष्ण की समाधि छूटने लगी। भाव में आप ही आप बातचीत कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (गेरुआ देखकर ) - " यह गेरुआ क्यों ? क्या कुछ लपेटने से ही हो गया ? ( हँसते हैं।) किसी ने कहा था - ' चंडी छोड़कर अब ढोल बजाता हूँ। 'पहले चंडी के गीत गाता था, फिर ढोल बजाने लगा। ( सब हँसते हैं।)


- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें