....इसी समय गेरुए वस्त्र पहने हुए एक अपरिचित बंगाली सज्जन आ पहुंचे। भक्तों के बीच में बैठ गए।
धीरे धीरे श्रीरामकृष्ण की समाधि छूटने लगी। भाव में आप ही आप बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण (गेरुआ देखकर ) - " यह गेरुआ क्यों ? क्या कुछ लपेटने से ही हो गया ? ( हँसते हैं।) किसी ने कहा था - ' चंडी छोड़कर अब ढोल बजाता हूँ। 'पहले चंडी के गीत गाता था, फिर ढोल बजाने लगा। ( सब हँसते हैं।)
- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से
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