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शुक्रवार, फ़रवरी 17, 2012

श्रीरामकृष्ण - " केशव एक दिन आया था। रात के 10 बजे तक रहा। प्रताप तथा अन्य किसी ने कहा, ' आज यहीं रहेंगे।' हम सब लोग वट-वृक्ष के नीचे ( पंचवटी में) बैठे थे। केशव ने कहा, ' नहीं, काम है, जाना होगा।'
उस समय मैंने हँसकर कहा , मछली की टोकरी की गंध न होने पर क्या नींद नहीं आयेगी? एक मछली बेचने वाली एक महिला के घर अतिथि बनी थी। मछली बेचकर आ रही थी , साथ में मछली की टोकरी थी। उसे फूल वाले कमरे में सोने को दिया गया। फूलों की गंध से उसे अधिक रात तक नींद नहीं आयी। घरवाली ने उसकी यह दशा देखकर कहा ,' क्यों , तुम छटपटा क्यों रही हो ? ' उसने कहा, ' कौन जाने भाई, इन फूलों की गंध से ही नींद नहीं आ रही है। मेरी मछली की टोकरी जरा ला दो , संभव है नींद आ जाये।' अंत में मछली की टोकरी लायी । उस पर जल छिड़क कर नाक के पास रख ली। फिर खर्राटे के साथ सो गयी ! "
" कहानी सुन कर केशव के दल वाले जोर से हँसने लगे।"

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से

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