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सोमवार, अक्टूबर 31, 2011

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कितना शोर करते हैं ये बच्चे !

नयी नयी दुनिया देखकर

चिहुँकते हैं / जानना चाहते हैं

बताना चाहते हैं / साझा करते हैं

अपने अनुभव

बहुत कुछ है भीतर

जो उमड़ता है /और रोकते नहीं वे

आने देतें हैं उसे /

सहज प्रवाह के साथ

और बड़े समझते हैं कि /

कितना शोर करते हैं ये बच्चे !!

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शुक्रवार, अक्टूबर 28, 2011

::माँ कहती है ::





माँ कहती है


'स्वेटर पहन'


वो क्या जाने


सर्दी मेरी सखी


झूम गलबहियां डाले


कैसी सुखद झुरझुरी


तन को दे जाती है !


माँ कहती है


'नीचे आ'


वो क्या जाने


जाने किस किस को छूकर


आई हुई हवा


मन को कितना भाती है !


माँ कहती है


'चुप भी कर '


वो सब जाने


बिटिया उसकी


बड़ी हुई जाती है !!


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तितली का स्कूल


हवा थपकियाँ देकर -

माँ कि जैसे

मुझको सुला रही है !

नदिया कलकल बहकर जैसे

मुझको लोरी सुना रही है !

धरती कि गोदी में सोकर

बदल का अंचल ओड़ा है !

और अचेतन मन ने

प्यारे सपनों से नाता जोड़ा है!

सुबह हुई कोयल ने लम्बी

कूक लगाकर मुझे उठाया !

शुरू हुआ चिड़ियों का कलरव

सबने भानु को शीश झुकाया!

किरणों ने गुदगुदी मचाई

कलियाँ हंसकर फूल बन गई !

खिली हुई ये सारी कलियाँ

तितली का स्कूल बन गई !!

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भोर


पक्षी चहके

भंवरे बहके

कुछ फूल खिले

कलियाँ डोली !

प्रातः की स्वर्ण

रश्मियों ने जब

अंगड़ाई ली

अँखियाँ खोली !

अलसाई तितली

ले पराग फूलों का

इधर उधर डोली !

और शांत झील की

लहरों ने

नीले जल से

अँखियाँ धो ली !

कुछ धूल उडी

पगडण्डी पर

बैलों की घंटियाँ बोली !

आराध्य की

अर्चना हुई

माला चन्दन

अक्षत रोली !

मंगलवार, अक्टूबर 25, 2011

" इस जगत में मनुष्य हजारों माता-पिताओं तथा सैंकड़ो स्त्री पुत्रों के संयोग-वियोग का अनुभव कर चुके हैं , करते हैं और करते रहेंगे । अज्ञानी पुरुष को प्रतिदिन हर्ष के हजारों और भय के सैंकड़ो अवसर प्राप्त होते हैं, किन्तु ज्ञानी के मन कोई प्रभाव नहीं पड़ता । मैं दोनों हाथ ऊपर उठा कर घोषणा कर रहा हूँ , पर मेरी बात कोई नहीं सुनता - धर्म से मोक्ष का मार्ग तो प्रशस्त होता ही है , अर्थ और काम की भी सिद्धि होती है , तो भी मानव उसका सेवन क्यों नहीं करता ? कामना से, भय से, लोभ से अथवा प्राण बचाने के लिए भी धर्म का त्याग हितकर नहीं है। धर्म नित्य है और हर्ष विषाद अनित्य। इसी प्रकार जीवात्मा नित्य है और उसके बंधन का हेतु अनित्य।



---------भारत सावित्री के नाम से प्रसिद्ध, 'महाभारत' का सार। ( महा-स्वर्गा५/६०-६४)
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यह संसार हमारे मनोभावों का प्रतिबिम्ब है !



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धन्य है वह झांझावत जो हमें प्रभु के संसर्ग में लाकर खड़ा कर देता है !



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ईश चिंतन को सांसारिक असावधानी का बहाना नहीं बनाया जा सकता !



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सिवा तुम्हारे कौन है

जग में, जग के पार

तुम ही तो कुछ भी नहीं

तुम सबके आधार !

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गुरुवार, अक्टूबर 20, 2011

शनिवार, अक्टूबर 15, 2011

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घर





आवासीय योजना


का शुभारम्भ (?)
कुछ इस तरह हुआ


कि


जंगल काटा गया


हजारों पक्षियों से उनके नीड़


पशुओं से उनकी


मांदे छीन ली गयी


उन्हें उजाड़ कर


अब आदमी बसाएगा



अपना घर !


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विरोधाभास


पृथ्वी का ताप

बढ रहा है निरन्तर

वैज्ञानिको का कहना है

पर रिश्तों की उष्णता

कम हो रही है

इसके साथ-साथ

ऐसा क्यों ?

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शनिवार, अक्टूबर 08, 2011

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मुन्नू और मम्मी




मुन्नू बेटा ऐसा मत कर


मुन्नू लग जाएगी


मुन्नू उतरो सीढ़ी से


यह सीढ़ी गिर जाएगी !


मुन्नू मिट्टी में मत खेलो


मुन्नू चुप हो जाओ


बहुत हो गयी धमाचौकड़ी


मुन्नू बस्ता लाओ !


मुन्नू गुड्डी के क्यूँ मारा


क्यों की यह शैतानी


इतने बड़े हो गए फिर भी


करते हो नादानी !


मुन्नू क्या ऐसे खाते हैं


मुन्नू घर में रहना


देखो साबुन लगा कान में


मुन्नू ये क्या पहना !


मुन्नू को गुस्सा आया, पर


उसने हार ना मानी


बोला -


मम्मी तुम मुन्नू बन जाओ अब


मैं भी कर लूँ मनमानी !!!!


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शनिवार, अक्टूबर 01, 2011

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अंजुरी में सूरज को भरकर

अर्पित कर दूँ उन लोगों पर

जिनकी द्र्ष्टी का सूरज से

टूट गया कब का नाता है

भूल गए वे क्या प्रकाश है

उन्हें तमस ही अब भाता है

जान ही लेंगे वे सूरज को

होंगे स्वागत को तत्पर

भूल अन्धेरे के दुर्दिन

आ जायेंगे ज्योति पथ पर

अंजुरी में सूरज .........................


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माँ




छत की मुंडेर पर




बालक, झुक जाता है बहुत अधिक




तभी देखती है उसे माँ




खींचती है पकड़कर




लगाती है एक थप्पड़




डांटती है




ओर जब बालक




पूरे वेग से रोने लगता है




तो उसे उठाकर




लगा लेती है सीने से




ओर रोने लगती है स्वय भी




बालक के साथ !

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अम्बर से



मूसलाधार बारिश



तो हुई



पर , बुझा न सकी



पेट की आग !



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अम्बर की स्लेट पर


तारों के अक्षर


हर रात लिखता है कोई


हर सुबह मिटा देता है


जिन्हें


सूरज का डस्टर


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उनके प्यार को सब


नाटक समझते हैं


उनके क्रोध का कोई


असर ही न रहा


उनकी (मुख ) मुद्रा का


भारी अवमूल्यन हो गया है !


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"नीशू जा पानी की बोटल ले आ"
नहीं मम्मी मुझे बहुत गर्मी लग रही है
" तो तू excercise क्यों कर रही है ?"
पापा सेहत के लिए ये बहुत जरुरी है !!