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मंगलवार, अक्टूबर 25, 2011

" इस जगत में मनुष्य हजारों माता-पिताओं तथा सैंकड़ो स्त्री पुत्रों के संयोग-वियोग का अनुभव कर चुके हैं , करते हैं और करते रहेंगे । अज्ञानी पुरुष को प्रतिदिन हर्ष के हजारों और भय के सैंकड़ो अवसर प्राप्त होते हैं, किन्तु ज्ञानी के मन कोई प्रभाव नहीं पड़ता । मैं दोनों हाथ ऊपर उठा कर घोषणा कर रहा हूँ , पर मेरी बात कोई नहीं सुनता - धर्म से मोक्ष का मार्ग तो प्रशस्त होता ही है , अर्थ और काम की भी सिद्धि होती है , तो भी मानव उसका सेवन क्यों नहीं करता ? कामना से, भय से, लोभ से अथवा प्राण बचाने के लिए भी धर्म का त्याग हितकर नहीं है। धर्म नित्य है और हर्ष विषाद अनित्य। इसी प्रकार जीवात्मा नित्य है और उसके बंधन का हेतु अनित्य।



---------भारत सावित्री के नाम से प्रसिद्ध, 'महाभारत' का सार। ( महा-स्वर्गा५/६०-६४)

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