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शुक्रवार, अक्टूबर 28, 2011

तितली का स्कूल


हवा थपकियाँ देकर -

माँ कि जैसे

मुझको सुला रही है !

नदिया कलकल बहकर जैसे

मुझको लोरी सुना रही है !

धरती कि गोदी में सोकर

बदल का अंचल ओड़ा है !

और अचेतन मन ने

प्यारे सपनों से नाता जोड़ा है!

सुबह हुई कोयल ने लम्बी

कूक लगाकर मुझे उठाया !

शुरू हुआ चिड़ियों का कलरव

सबने भानु को शीश झुकाया!

किरणों ने गुदगुदी मचाई

कलियाँ हंसकर फूल बन गई !

खिली हुई ये सारी कलियाँ

तितली का स्कूल बन गई !!

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