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-बेघर फिरे उजाला-
सत्य कहीं नेपथ्य रह गया
झूंठ को अर्पित होती माला।
अंधकार की बनी कोठियां
बेघर फिरे उजाला॥
ऋतुचक्र ही बदल गया है
मानव ने ये क्या कर डाला ।
केलेंडर में जेठ मास है
फसलों पर पड़ता पाला ॥
छल प्रपंच और नेह प्रेम ने
यदि जीना दूभर कर डाला।
तो बैठे कहीं हिमालय की
कन्दरा में, लेकर मृग-छाला॥
जीवन बहुत निराला साथी
जीवन बहुत निराला !!
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