गिरीश - ( सहास्य) - महाराज ! हम लोग तो अनर्गल बातें कर रहे हैं , और मास्टर चुपचाप बैठे हुए हैं -जरा भी जुबान नहीं हिलाते। महाराज, ये क्या सोचते हैं?
श्री रामकृष्ण -( हँसते हुए ) - " अधिक बकवाद करने वाला, अधिक चुप्पी साधने वाला, कान में तुलसी खोंसने वाला आदमी, बड़ा लम्बा घूँघट निकालनेवाली स्त्री, काई वाले तालाब का पानी; इनकी गणना अनर्थ-कारियों में हैं। ( सब हँसते हैं)
परन्तु ये ऐसे नहीं हैं , ये गंभीर प्रकृति के हैं। ( सब हंसते हैं। )
- श्री रामकृष्ण वचनामृत से
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