[ जो कुछ मैंने हिन्दू धर्म के लिए किया है, राजा अजीत सिंह के सहयोग के बिना वह संभव नहीं होता : स्वामी विवेकानंद ]
गुरुवार, नवंबर 17, 2011
मंगलवार, नवंबर 15, 2011
शनिवार, नवंबर 12, 2011
शुक्रवार, नवंबर 11, 2011
बुधवार, नवंबर 09, 2011
चलती चक्की देख के
दिया कबीरा ऱोय।
दो पाटन के बीच में
साबुत बचा न कोय॥
" यह संसार चक्की है और चक्की जिस के सहारे और जिसके चारों तरफ घूम रही है वह केंद्र बिंदु है, भक्त जिसे भगवान कहते है और ज्ञानी जिसे परमात्मा कहते हैं । तो इस चक्की में वे दाने जो केंद्र का आश्रय ले लेते हैं, उसकी शरण में चले जाते हैं , वे पिसने से बच जाते हैं। संसार रूपी चक्की में पिसने से बचना हो तो उनका आश्रय लो, उनकी शरण में चले जाओ।" ------------रामकृष्ण परमहंस देव
मंगलवार, नवंबर 08, 2011
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-बेघर फिरे उजाला-
सत्य कहीं नेपथ्य रह गया
झूंठ को अर्पित होती माला।
अंधकार की बनी कोठियां
बेघर फिरे उजाला॥
ऋतुचक्र ही बदल गया है
मानव ने ये क्या कर डाला ।
केलेंडर में जेठ मास है
फसलों पर पड़ता पाला ॥
छल प्रपंच और नेह प्रेम ने
यदि जीना दूभर कर डाला।
तो बैठे कहीं हिमालय की
कन्दरा में, लेकर मृग-छाला॥
जीवन बहुत निराला साथी
जीवन बहुत निराला !!
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सोमवार, नवंबर 07, 2011
शनिवार, नवंबर 05, 2011
शुक्रवार, नवंबर 04, 2011
सोमवार, अक्टूबर 31, 2011
शुक्रवार, अक्टूबर 28, 2011
तितली का स्कूल
हवा थपकियाँ देकर -
माँ कि जैसे
मुझको सुला रही है !
नदिया कलकल बहकर जैसे
मुझको लोरी सुना रही है !
धरती कि गोदी में सोकर
बदल का अंचल ओड़ा है !
और अचेतन मन ने
प्यारे सपनों से नाता जोड़ा है!
सुबह हुई कोयल ने लम्बी
कूक लगाकर मुझे उठाया !
शुरू हुआ चिड़ियों का कलरव
सबने भानु को शीश झुकाया!
किरणों ने गुदगुदी मचाई
कलियाँ हंसकर फूल बन गई !
खिली हुई ये सारी कलियाँ
तितली का स्कूल बन गई !!
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मंगलवार, अक्टूबर 25, 2011
" इस जगत में मनुष्य हजारों माता-पिताओं तथा सैंकड़ो स्त्री पुत्रों के संयोग-वियोग का अनुभव कर चुके हैं , करते हैं और करते रहेंगे । अज्ञानी पुरुष को प्रतिदिन हर्ष के हजारों और भय के सैंकड़ो अवसर प्राप्त होते हैं, किन्तु ज्ञानी के मन कोई प्रभाव नहीं पड़ता । मैं दोनों हाथ ऊपर उठा कर घोषणा कर रहा हूँ , पर मेरी बात कोई नहीं सुनता - धर्म से मोक्ष का मार्ग तो प्रशस्त होता ही है , अर्थ और काम की भी सिद्धि होती है , तो भी मानव उसका सेवन क्यों नहीं करता ? कामना से, भय से, लोभ से अथवा प्राण बचाने के लिए भी धर्म का त्याग हितकर नहीं है। धर्म नित्य है और हर्ष विषाद अनित्य। इसी प्रकार जीवात्मा नित्य है और उसके बंधन का हेतु अनित्य।
---------भारत सावित्री के नाम से प्रसिद्ध, 'महाभारत' का सार। ( महा-स्वर्गा५/६०-६४)
गुरुवार, अक्टूबर 20, 2011
शनिवार, अक्टूबर 15, 2011
शनिवार, अक्टूबर 08, 2011
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मुन्नू और मम्मी
मुन्नू बेटा ऐसा मत कर
मुन्नू लग जाएगी
मुन्नू उतरो सीढ़ी से
यह सीढ़ी गिर जाएगी !
मुन्नू मिट्टी में मत खेलो
मुन्नू चुप हो जाओ
बहुत हो गयी धमाचौकड़ी
मुन्नू बस्ता लाओ !
मुन्नू गुड्डी के क्यूँ मारा
क्यों की यह शैतानी
इतने बड़े हो गए फिर भी
करते हो नादानी !
मुन्नू क्या ऐसे खाते हैं
मुन्नू घर में रहना
देखो साबुन लगा कान में
मुन्नू ये क्या पहना !
मुन्नू को गुस्सा आया, पर
उसने हार ना मानी
बोला -
मम्मी तुम मुन्नू बन जाओ अब
मैं भी कर लूँ मनमानी !!!!
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शनिवार, अक्टूबर 01, 2011
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