20.3.1997
20.3. 2000-3
'चुप रहना एक बात है और शांति पाना दूसरी। चुप्पी कि कोख से शांति का सृजन नहीं होता।
कलम इस समय चुप है। लिखने का औचित्य इन दिनों ज्ञात नहीं हो पा रहा। प्रश्न ही उठता है बार बार, क्यों लिखूं मैं ? फिर स्वयं की अल्पज्ञता का भी भान होता है। लिखने का सार क्या है? और बात सिर्फ लिखने की ही नहीं है, बात इस पूरे जीवन की ही है। क्या है सार? विचारो ने पंक्तिबद्ध रहना छोड़ दिया है। वे "एक के ऊपर एक गिरते हैं "। इसका एक ही परिणाम हो सकता है कि कलम की जुबान बंद रहे ; और जब स्वर ही नहीं निकलेंगे तो , वायु तो बहती रहे अनवरत, वाणी कहाँ से आयेगी।
इस कलम को एक और रख देने की इच्छा होती है। मन के सागर में होने वाली हलचलों को व्यक्त करने में यह समर्थ नहीं लगती। एक भिक्षुक रोज भिक्षा लेने आता है। वह आवाज लगाता है ,' जै हो, शंकर की माया', और शंकर भगवान क्या कहते हैं, ' उमा दारुयोशित की नाइ -सबही नचावत राम गुसाईं' । सूरदास जी कहते है, ' अब मैं बहुत नाच्यो गोपाल...'.............."