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सोमवार, दिसंबर 05, 2011

3.4.1992
" ये कौन झाँक रहा है अम्बर के पीछे से, धरती के नीचे से ।
ये कौन विद्यमान है, यहाँ और वहाँ।
ये कौन कर रहा है, जीवन और मृत्यु की क्रीडा,
ये कौन बाँटता फिरता सुख और पीड़ा ।
ये कौन गा रहा है, अनंत काल से
ये कौन जा रहा है निर्भय चाल से ।
ये कौन बनाता मोहरे हमको, अपने,
ये कौन दिखाता सुन्दर सुखमय सपने ।
ये है कौन , कहाँ से आता ,
प्रलय पलों में भी , जीवन गाथा गाता ।
ये कौन सृष्टि का अद्भुत रचनाकार है,
पत्थर से मानव तक, फैला जिसका विस्तार है।
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