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बुधवार, नवंबर 30, 2011

ऐसा लगता है कि धन का बहुत महत्व है।
हाँ , ऐसा लगता है !
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हिन्दी अनुवाद - From ' Man and Money' by Swami Purushottamananda

मंगलवार, नवंबर 29, 2011

गिरीश - ( सहास्य) - महाराज ! हम लोग तो अनर्गल बातें कर रहे हैं , और मास्टर चुपचाप बैठे हुए हैं -जरा भी जुबान नहीं हिलाते। महाराज, ये क्या सोचते हैं?

श्री रामकृष्ण -( हँसते हुए ) - " अधिक बकवाद करने वाला, अधिक चुप्पी साधने वाला, कान में तुलसी खोंसने वाला आदमी, बड़ा लम्बा घूँघट निकालनेवाली स्त्री, काई वाले तालाब का पानी; इनकी गणना अनर्थ-कारियों में हैं। ( सब हँसते हैं)

परन्तु ये ऐसे नहीं हैं , ये गंभीर प्रकृति के हैं। ( सब हंसते हैं। )

- श्री रामकृष्ण वचनामृत से

श्री रामकृष्ण - ".........सब ईश्वर की इच्छा से हो रहा है। यहाँ पर यदि तुम्हे चैतन्य प्राप्त हो , तो मुझे निमित्त मात्र जानना। चंदा मामा सभी के मामा है। ईश्वर की इच्छा से सब हो रहा है।

गिरीश ( हंसते हुए )- ईश्वर की इच्छा से न ? मैं भी तो यहीं कह रहा हूँ । (सभी की हंसी)


- श्री रामकृष्ण वचनामृत से
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क्या आप किसी व्यक्ति को परखना चाहते हैं?
तो उसे धन दीजिये !
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हिन्दी अनुवाद- From 'Man and Money' by Swami Purushottamananda

सोमवार, नवंबर 28, 2011

*रुपया/डॉलर/येन/यूरो *

आदमी ने
कागज के एक टुकड़े को
कुछ मूल्य दिया ,
और आज
कागज का वहीँ टुकड़ा
आदमी का मूल्य आंकता है !
कैसी विडम्बना है !!!


हिंदी अनुवाद -from -'Man and Money' by Swami Purushottamananda
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गुरुवार, नवंबर 24, 2011

श्री रामकृष्ण - ( भक्तों से )- मन से काम और कांचन के गए बिना अवतार को पहचानना मुश्किल हैं। किसी बैंगन वाले से हीरे का मोल पूछा था। उसने कहा, ' मैं इसके बदले में नौ सेर बैंगन दे सकूँगा। इससे अधिक एक भी नहीं!' ( सब हँस पड़े।)


- रामकृष्ण वचनामृत से

बुधवार, नवंबर 23, 2011

श्री रामकृष्ण - "....और चैतन्य ने इस नाम का प्रचार किया था ( हरिनाम का)। देखो चैतन्य देव कितने बड़े पण्डित थे और वे अवतार थे। उन्होंने इस नाम का प्रचार किया था अतएव यह बहुत ही अच्छा है। ( हंसते हुए) कुछ किसान एक न्योते में गए थे। भोजन करते समय उनसे पूछा गया, तुम लोग आमड़े की खटाई खाओगे? उन्होंने कहा, 'बाबूओ ने अगर उसे खाया हो तो हमें भी देना।' मतलब यह कि उन्होंने अगर खाया होगा तो वह चीज अच्छी ही होगी! (सब हंसते हैं)।




- रामकृष्ण वचनामृत से

सोमवार, नवंबर 21, 2011

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श्री रामकृष्ण कुछ मिष्ठान गृहण करके जायेंगे।
केशव (चन्द्र सेन) के बड़े लड़के वहां आकर बैठे।
अमृत ने कहा - ' यह केशव का बड़ा लड़का है। आप आशीर्वाद दीजिये। यह क्या! सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दीजिये। '
श्री रामकृष्ण ने कहा "मुझे आशीर्वाद न देना चाहिये।" यह कहकर मुस्कुराते हुए बच्चे की देह पर हाथ फेरने लगे।
अमृत ( हँसते हुए ) - अच्छा तो देह पर हाथ फेरिये। ( सब हंसते हैं।)



-श्री रामकृष्ण वचनामृत

शुक्रवार, नवंबर 18, 2011

श्री रामकृष्ण - (शशधर के प्रति ) - "तुम शक्ति की बात कुछ कहो।"

शशधर - "मैं क्या जानता हूँ ?"


श्री रामकृष्ण ( हंसते हुए ) - "एक आदमी एक व्यक्ति की बहुत भक्ति करता था। उसने उस भक्त से तम्बाकू भर लाने के लिए कहा। इस पर भक्त ने कहा 'क्या मैं आपकी आग लाने के योग्य हूँ ?' फिर आग भी नहीं लाया !" ( सब हंसते हैं। )

-रामकृष्ण वचनामृत से

श्री रामकृष्ण - "कुछ गीता , भागवत और वेदान्त पढ कर लोग सोचते हैं, हमने सब समझ लिया। चीनी के पहाड़ पर एक चींटी गई थी। एक दाना खाने से ही उसका पेट भर गया। एक दाना और मुहं में दबा कर वह घर लौट पड़ी। जाते हुए सोच रही थी, अबकी बार आकर सारा पहाड़ उठा ले जाउंगी।" ( सब हंसते हैं। )



--रामकृष्ण वचनामृत से

गुरुवार, नवंबर 17, 2011

राजा अजीत सिंह, खेतड़ी

[ जो कुछ मैंने हिन्दू धर्म के लिए किया है, राजा अजीत सिंह के सहयोग के बिना वह संभव नहीं होता : स्वामी विवेकानंद ]

- एक माँ : दो रोटियां -


माँ के लिए

कितने आनंद का कार्य होता है

अपने चार बेटों के लिए

भोजन पकाना !

पर उन्ही चार बेटों पर

उस एक माँ की

दो रोटियां

इतनी भारी क्यों पड़ती है ?

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मंगलवार, नवंबर 15, 2011

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जिंदगी की शाम ढलने वाली है

'रुकने वाली साँस' चलने वाली है।


जी है किसी ने जिंदगी भरपूर

और किसी ने बला टाली है।.....



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शनिवार, नवंबर 12, 2011

नैतिकता की चादर झीनी


तार तार होने वाली


उसमे मानव ने बना लिए है


कई झरोखे और जाली !!



शुक्रवार, नवंबर 11, 2011

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मिनी : पापा, आप बिना मूंछों के ही अच्छे लगते हो।
नीशू: नहीं पापा, ऐसे मुझे अच्छे नहीं लगते।
मिनी : पर पापा ...( नीशू बात काटकर) तो पापा , ये ताऊ * को देख सकती है न !!

*( ताऊ मूंछे नहीं रखते )

गुरुवार, नवंबर 10, 2011

बुधवार, नवंबर 09, 2011

चलती चक्की देख के

दिया कबीरा ऱोय।

दो पाटन के बीच में

साबुत बचा न कोय॥


" यह संसार चक्की है और चक्की जिस के सहारे और जिसके चारों तरफ घूम रही है वह केंद्र बिंदु है, भक्त जिसे भगवान कहते है और ज्ञानी जिसे परमात्मा कहते हैं । तो इस चक्की में वे दाने जो केंद्र का आश्रय ले लेते हैं, उसकी शरण में चले जाते हैं , वे पिसने से बच जाते हैं। संसार रूपी चक्की में पिसने से बचना हो तो उनका आश्रय लो, उनकी शरण में चले जाओ।" ------------रामकृष्ण परमहंस देव

मंगलवार, नवंबर 08, 2011

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-बेघर फिरे उजाला-



सत्य कहीं नेपथ्य रह गया

झूंठ को अर्पित होती माला।

अंधकार की बनी कोठियां

बेघर फिरे उजाला॥


ऋतुचक्र ही बदल गया है

मानव ने ये क्या कर डाला ।

केलेंडर में जेठ मास है

फसलों पर पड़ता पाला ॥


छल प्रपंच और नेह प्रेम ने

यदि जीना दूभर कर डाला।

तो बैठे कहीं हिमालय की

कन्दरा में, लेकर मृग-छाला॥


जीवन बहुत निराला साथी

जीवन बहुत निराला !!


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सोमवार, नवंबर 07, 2011

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- न्याय -
घूमती हुई हवा
और आकाश
यदि दे सकते
गवाही !
तो कितना
सरल हो जाता
पाना
न्याय !
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शनिवार, नवंबर 05, 2011

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चुप रहा था मैं तो


उनके अदब कि ख़ातिर


कहते रहे वे सबसे -


"जुबान नहीं है !"


.......


......


लेते थे शिखर पर


हाथों हाथ जो हमें


आते ही जमीं पर


कहे, पहचान नहीं है


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साईं को साँच(सत्य) पियारा

साँचे साँच सुहावे देखो

साँचा सिरजनहारा

साईं को ....

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शुक्रवार, नवंबर 04, 2011

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मन बहुत उदास है


ना जाने आज, क्या खास है !


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फिर मत कहना



कुछ कर ना सके ।



जब नर तन तुम्हे निरोग मिला



सद्संगति का भी योग मिला,



फिर भी प्रभु कृपा अनुभव करके



यदि भवसागर से तर ना सके !



फिर मत कहना.......



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सोमवार, अक्टूबर 31, 2011

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कितना शोर करते हैं ये बच्चे !

नयी नयी दुनिया देखकर

चिहुँकते हैं / जानना चाहते हैं

बताना चाहते हैं / साझा करते हैं

अपने अनुभव

बहुत कुछ है भीतर

जो उमड़ता है /और रोकते नहीं वे

आने देतें हैं उसे /

सहज प्रवाह के साथ

और बड़े समझते हैं कि /

कितना शोर करते हैं ये बच्चे !!

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शुक्रवार, अक्टूबर 28, 2011

::माँ कहती है ::





माँ कहती है


'स्वेटर पहन'


वो क्या जाने


सर्दी मेरी सखी


झूम गलबहियां डाले


कैसी सुखद झुरझुरी


तन को दे जाती है !


माँ कहती है


'नीचे आ'


वो क्या जाने


जाने किस किस को छूकर


आई हुई हवा


मन को कितना भाती है !


माँ कहती है


'चुप भी कर '


वो सब जाने


बिटिया उसकी


बड़ी हुई जाती है !!


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तितली का स्कूल


हवा थपकियाँ देकर -

माँ कि जैसे

मुझको सुला रही है !

नदिया कलकल बहकर जैसे

मुझको लोरी सुना रही है !

धरती कि गोदी में सोकर

बदल का अंचल ओड़ा है !

और अचेतन मन ने

प्यारे सपनों से नाता जोड़ा है!

सुबह हुई कोयल ने लम्बी

कूक लगाकर मुझे उठाया !

शुरू हुआ चिड़ियों का कलरव

सबने भानु को शीश झुकाया!

किरणों ने गुदगुदी मचाई

कलियाँ हंसकर फूल बन गई !

खिली हुई ये सारी कलियाँ

तितली का स्कूल बन गई !!

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भोर


पक्षी चहके

भंवरे बहके

कुछ फूल खिले

कलियाँ डोली !

प्रातः की स्वर्ण

रश्मियों ने जब

अंगड़ाई ली

अँखियाँ खोली !

अलसाई तितली

ले पराग फूलों का

इधर उधर डोली !

और शांत झील की

लहरों ने

नीले जल से

अँखियाँ धो ली !

कुछ धूल उडी

पगडण्डी पर

बैलों की घंटियाँ बोली !

आराध्य की

अर्चना हुई

माला चन्दन

अक्षत रोली !

मंगलवार, अक्टूबर 25, 2011

" इस जगत में मनुष्य हजारों माता-पिताओं तथा सैंकड़ो स्त्री पुत्रों के संयोग-वियोग का अनुभव कर चुके हैं , करते हैं और करते रहेंगे । अज्ञानी पुरुष को प्रतिदिन हर्ष के हजारों और भय के सैंकड़ो अवसर प्राप्त होते हैं, किन्तु ज्ञानी के मन कोई प्रभाव नहीं पड़ता । मैं दोनों हाथ ऊपर उठा कर घोषणा कर रहा हूँ , पर मेरी बात कोई नहीं सुनता - धर्म से मोक्ष का मार्ग तो प्रशस्त होता ही है , अर्थ और काम की भी सिद्धि होती है , तो भी मानव उसका सेवन क्यों नहीं करता ? कामना से, भय से, लोभ से अथवा प्राण बचाने के लिए भी धर्म का त्याग हितकर नहीं है। धर्म नित्य है और हर्ष विषाद अनित्य। इसी प्रकार जीवात्मा नित्य है और उसके बंधन का हेतु अनित्य।



---------भारत सावित्री के नाम से प्रसिद्ध, 'महाभारत' का सार। ( महा-स्वर्गा५/६०-६४)
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यह संसार हमारे मनोभावों का प्रतिबिम्ब है !



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धन्य है वह झांझावत जो हमें प्रभु के संसर्ग में लाकर खड़ा कर देता है !



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ईश चिंतन को सांसारिक असावधानी का बहाना नहीं बनाया जा सकता !



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सिवा तुम्हारे कौन है

जग में, जग के पार

तुम ही तो कुछ भी नहीं

तुम सबके आधार !

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गुरुवार, अक्टूबर 20, 2011