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शनिवार, दिसंबर 10, 2011

श्री रामकृष्ण -(सहास्य)- " ....... और यहाँ आकर कुछ पूजा भी नहीं चढानी पड़ती। यदु की माँ ने इस पर कहा - दूसरे साधू बस लाओ लाओ किया करते हैं। बाबा , तुममे यह बात नहीं है। " विषयी आदमियों का जी ही निकल आता है अगर उन्हें गांठ का पैसा खर्च करना पड़े।
एक जगह नाटक हो रहा था । एक आदमी को बैठकर सुनने की बड़ी इच्छा थी। उसने झांककर देखा, तो मालूम हुआ कि यदि कोई बैठकर देखना चाहता है तो उससे टिकिट के दाम लिए जाते हैं , फिर क्या था , वहां से चलता बना। एक दूसरी जगह नाटक हो रहा था , वह वहां गया। पूछने पर मालूम हुआ, वहां टिकिट नहीं लगता । वहां बड़ी भीड़ थी। वह दोनों हाथों से भीड़ को हटाकर बीच महफ़िल में पहुंचा। वहां अच्छी तरह जमकर मूंछों पर ताव दे देकर सुनने लगा। (सब हँसते हैं)


- श्री रामकृष्ण वचनामृत से

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