श्री रामकृष्ण - "वासना के रहे बिना शरीर धारण नहीं हो सकता। (सहास्य) मुझे भी दो एक इच्छाएं थी। मैंने कहा था , ' माँ , कामिनी कांचन त्यागियों का सत्संग मुझे दो। और ज्ञानी और भक्तों का सत्संग करूँगा। अतएव कुछ शक्ति भी दे दे , जिससे कुछ चल सकूँ - यहाँ -वहां जा सकूँ।' परन्तु उसने चलने की शक्ति नहीं दी। "त्रैलोक्य (सहास्य) - साध मिटी ?श्री रामकृष्ण -(सहास्य) - कुछ बाकी है। ( सब हँसते हैं.) - श्री रामकृष्ण वचनामृत से
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें