श्री रामकृष्ण - "दर्शन के बाद कभी कभी भक्त की साध होती है कि उनकी लीला देखें।
श्री रामचंद्र जी जब राक्षसों को मारकर लंकापुरी में घुसे तो बुड्ढी निकषा भागी। तब लक्ष्मण बोले, ' हे राम , भला यह क्या है ? यह निकषा इतनी बुड्ढी है, पुत्र शोक भी इसको कम नहीं हुआ, फिर भी इसे प्राणों का इतना भय है कि भाग रही है ! ' श्री रामचंद्र जी ने निकषा को अभय देते हुए सामने लाकर कारण पूछा। वह बोली, ' राम इतने दिनों तक बची हूँ, इसीलिए तुम्हारी इतनी लीला देखी। यहीं कारण है कि और भी बचना चाहती हूँ। न जाने और कितनी लीलाएं देखूं ! ' " ( सब हंसते हैं।)
-श्री रामकृष्ण वचनामृत से
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें