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शुक्रवार, दिसंबर 23, 2011

कुछ देर विश्राम करके श्री रामकृष्ण दक्षिणेश्वर चले। जाते समय सुरेन्द्र के कल्याण की कामना करते हैं। सब कमरों में एक एक बार जाते हैं और मधुर स्वर में नामोच्चार कर रहे हैं। कुछ अधूरा न रखेगें , इसलिए खड़े हुए कह रहे हैं - ' मैंने उस समय पुड़ी नहीं खाई, थोड़ी सी ले आओ।'
बिलकुल जरा सी लेकर खा रहे हैं और कह रहे हैं- ' इसके बहुत से अर्थ है। पुड़ी नहीं खाई, यह याद आएगा तो फिर आने की इच्छा होगी।' (सब हंसते है।)
मणि मल्लिक ( सहास्य) - अच्छा तो था , हम लोग भी आते। ( भक्त मंडली हंस रही है।)


-रामकृष्ण वचनामृत से

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