आओ मन को खोलें -
कुछ बोलें ।
घनीभूत पीड़ा का संग्रह
कब तक कर पाओगे
अपना अंतरगान कब तक
स्वर बिना गाओगे ,
जीवन के सुख दुःख को अपने
मन के पलड़े में तोलें
आओ खुश हो ले !
तृश्नाऍ उठती रही
ज्यों सागर की लहर
कर्म भूमि में जुटे रहे हम
बीते जीवन के कई पहर ,
अब कुछ क्षण तो नयन मूंदकर
स्वप्न वीथिका में डोलें -
आओ कुछ सो ले !
मन में उठती हूक दबाकर
मुस्काने ओढे
रहे
रहे
लिपटे झूंठे आडम्बर में
'अपने ' को छोड़े रहे,
मन का गहन विषाद अपने
अश्रुओ से धो ले-
आओ कुछ ........
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