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शनिवार, दिसंबर 10, 2011

आओ मन को खोलें -

कुछ बोलें ।

घनीभूत पीड़ा का संग्रह

कब तक कर पाओगे

अपना अंतरगान कब तक

स्वर बिना गाओगे ,

जीवन के सुख दुःख को अपने

मन के पलड़े में तोलें

आओ खुश हो ले !

तृश्नाऍ उठती रही

ज्यों सागर की लहर

कर्म भूमि में जुटे रहे हम

बीते जीवन के कई पहर ,

अब कुछ क्षण तो नयन मूंदकर

स्वप्न वीथिका में डोलें -

आओ कुछ सो ले !

मन में उठती हूक दबाकर

मुस्काने ओढे
रहे

लिपटे झूंठे आडम्बर में

'अपने ' को छोड़े रहे,

मन का गहन विषाद अपने

अश्रुओ से धो ले-

आओ कुछ ........


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