सींती के महेंद्र वैद्य आये हैं। श्री रामकृष्ण हंसते हुए राखाल को इशारा कर रहे हैं, " हाथ दिखा लो।" रामलाल से कह रहे हैं, "गिरीश घोष के साथ प्रेम कर तो थियेटर देख सकेगा।" (हंसी)
श्री रामकृष्ण -( नरेन्द्र के प्रति)- तू क्या हाजरा के पास बैठा था ? तू विदेशी है और वह विरही ! हाजरा को भी डेढ़ हजार रुपयों की आवश्यकता है। (हंसी)
" हाजरा कहता है, ' नरेन्द्र में सोलह आना सतोगुण आ गया है, परन्तु रजोगुण की जरा लाली है. मेरा विशुद्ध सत्त्व , सत्रह आना।' " ( सभी की हंसी)
-श्री रामकृष्ण वचनामृत से
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