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मंगलवार, दिसंबर 20, 2011

श्री रामकृष्ण - [नरेन्द्र { बाद में स्वामी विवेकानंद} से] - "क्यों नरेन्द्र, भला तू क्या कहेगा ? संसारी मनुष्य तो न जाने क्या क्या कहते हैं। पर याद रहे कि हाथी जब जाता है, तब उसके पीछे पीछे कितने ही जानवर बेतरह चिल्लाते हैं। पर हाथी लौटकर देखता तक नहीं। तेरी कोई निंदा करे तो तू क्या समझेगा?


नरेन्द्र - मै तो यह समझूंगा कि कुत्ते भोंकते हैं।


श्री रामकृष्ण (सहास्य) - अरे नहीं, यहाँ तक नहीं। ( सब का हास्य) सर्व भूतों में परमात्मा का ही वास है। पर मेल मिलाप करना हो तो भले आदमियों से ही करना चाहिए, बुरे आदमियों से अलग ही रहना चाहिए। बाघ में भी परमात्मा का वास है, इसलिए क्या बाघ को भी गले लगाना चाहिए ? ( लोग हंस पड़े।)


- रामकृष्ण वचनामृत से

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