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मंगलवार, दिसंबर 20, 2011
"पर हित सरस धर्म नहीं भाई , पर पीडा सम नहीं ....."
- गोस्वामी तुलसीदासजी
'क्यों भाई , क्या कर रहे हो ?'
'कांटे बो रहा हूँ जी , ये आगे जाने की राह है , इसमें।'
' पर फिर तुम आगे कैसे जा पाओगे?'
मुझे कौनसा आगे जाना है, पर मै उनको भी नहीं जाने दूंगा.'
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