नव वर्ष की शुभकामनाये
अब नव वर्ष में ही मिलना होगा ?
शुक्रवार, दिसंबर 23, 2011
कुछ देर विश्राम करके श्री रामकृष्ण दक्षिणेश्वर चले। जाते समय सुरेन्द्र के कल्याण की कामना करते हैं। सब कमरों में एक एक बार जाते हैं और मधुर स्वर में नामोच्चार कर रहे हैं। कुछ अधूरा न रखेगें , इसलिए खड़े हुए कह रहे हैं - ' मैंने उस समय पुड़ी नहीं खाई, थोड़ी सी ले आओ।'
बिलकुल जरा सी लेकर खा रहे हैं और कह रहे हैं- ' इसके बहुत से अर्थ है। पुड़ी नहीं खाई, यह याद आएगा तो फिर आने की इच्छा होगी।' (सब हंसते है।)
मणि मल्लिक ( सहास्य) - अच्छा तो था , हम लोग भी आते। ( भक्त मंडली हंस रही है।)
बिलकुल जरा सी लेकर खा रहे हैं और कह रहे हैं- ' इसके बहुत से अर्थ है। पुड़ी नहीं खाई, यह याद आएगा तो फिर आने की इच्छा होगी।' (सब हंसते है।)
मणि मल्लिक ( सहास्य) - अच्छा तो था , हम लोग भी आते। ( भक्त मंडली हंस रही है।)
-रामकृष्ण वचनामृत से
पंडित जी- तीर्थाटन के लिए महाराज कहाँ तक गए हैं ?
श्री रामकृष्ण- हाँ , कई स्थान देखे हैं। (सहास्य ) हाजरा बहुत दूर तक गया है और बहुत ऊँचे तक चढ़ गया था , हृषिकेश तक हो आया है। ( सबका हँसना। ) मै इतनी दूर तक नहीं जा सका, इतने ऊँचे नहीं चढ़ा।
गिद्ध भी बहुत ऊँचे चढ़ जाता है। परन्तु उसकी दृष्टि मरघट पर ही रहती है। ( सब हंसते हैं।) मरघट का क्या अर्थ है जानते हो ? मरघट अर्थात कामिनी -कांचन।
श्री रामकृष्ण- हाँ , कई स्थान देखे हैं। (सहास्य ) हाजरा बहुत दूर तक गया है और बहुत ऊँचे तक चढ़ गया था , हृषिकेश तक हो आया है। ( सबका हँसना। ) मै इतनी दूर तक नहीं जा सका, इतने ऊँचे नहीं चढ़ा।
गिद्ध भी बहुत ऊँचे चढ़ जाता है। परन्तु उसकी दृष्टि मरघट पर ही रहती है। ( सब हंसते हैं।) मरघट का क्या अर्थ है जानते हो ? मरघट अर्थात कामिनी -कांचन।
-रामकृष्ण वचनामृत से
कलकत्ते से ईशान आये हैं। फिर ईश्वरी प्रसंग हो रहा है। ईशान को ईश्वर पर बड़ा विश्वास है। वे कहते हैं, जो घर से निकलते समय एक बार भी दुर्गा नाम स्मरण कर लेते हैं, शूल हाथ में लिए शूलपाणी उनके साथ जाया करते हैं। विपत्ति में फिर भय क्या है। शिव स्वयं उसकी रक्षा करते हैं।
श्री रामकृष्ण -(ईशान से) - तुम्हे बड़ा विश्वास है। हम लोगों को इतना नहीं है। ( सब हंसते हैं।)
-रामकृष्ण वचनामृत से
श्री रामकृष्ण - ........बहुत कुछ बात होने के बाद देवेन्द्र ( देवेन्द्र नाथ ठाकुर ) ने खुश होकर कहा- आपको उत्सव में आना होगा।'
मैंने कहा, ' वह ईश्वर कि इच्छा ; मेरी यह अवस्था तो देख ही रहे हो- वे कभी किसी भाव में रखते हैं , कभी किसी भाव में। '
देवेन्द्र ने कहा - 'नहीं आना ही होगा। परन्तु धोती और चद्दर ये दोनों कपडे आप जरुर पहने हुए हो, आपको उलजलूल देख कर किसी ने कुछ कह दिया तो मुझे बड़ा कष्ट होगा।'
मैंने कहा , ' यह मुझसे न होगा। मैं बाबू न बन सकूँगा।' देवेन्द्र और सेजो बाबु हँसने लगे।
उसके दूसरे ही दिन सेजो बाबू के पास देवेन्द्र की चिट्ठी आई- मुझे उत्सव देखने के लिए जाने से उन्होंने रोका था। लिखा था, ' देह पर एक चद्दर भी न रहेगी तो असभ्यता होगी।' ( सब हंसते हैं।)
- श्री रामकृष्ण वचनामृत से
बुधवार, दिसंबर 21, 2011
सींती के महेंद्र वैद्य आये हैं। श्री रामकृष्ण हंसते हुए राखाल को इशारा कर रहे हैं, " हाथ दिखा लो।" रामलाल से कह रहे हैं, "गिरीश घोष के साथ प्रेम कर तो थियेटर देख सकेगा।" (हंसी)
श्री रामकृष्ण -( नरेन्द्र के प्रति)- तू क्या हाजरा के पास बैठा था ? तू विदेशी है और वह विरही ! हाजरा को भी डेढ़ हजार रुपयों की आवश्यकता है। (हंसी)
" हाजरा कहता है, ' नरेन्द्र में सोलह आना सतोगुण आ गया है, परन्तु रजोगुण की जरा लाली है. मेरा विशुद्ध सत्त्व , सत्रह आना।' " ( सभी की हंसी)
-श्री रामकृष्ण वचनामृत से
श्री रामकृष्ण -( किशोर भक्तों से )- "तुम लोग त्रैलोक्य की पुस्तक -भक्ति चैतन्य चन्द्रिका- पढना उससे एक किताब मांग लेना। उसमे चैतन्य की बड़ी अच्छी बातें लिखी है। "
एक भक्त - " क्या वे देंगे ?"
श्री रामकृष्ण - (सहास्य)- "क्यों, खेत में अगर बहुत सी ककड़ियाँ हुई हो, तो मालिक दो तीन मुफ्त ही दे सकता है। ( सब हंसते हैं। ) मुफ्त देगा क्यों नहीं, तू कहता क्या है । ( हास्य )
एक भक्त - " क्या वे देंगे ?"
श्री रामकृष्ण - (सहास्य)- "क्यों, खेत में अगर बहुत सी ककड़ियाँ हुई हो, तो मालिक दो तीन मुफ्त ही दे सकता है। ( सब हंसते हैं। ) मुफ्त देगा क्यों नहीं, तू कहता क्या है । ( हास्य )
- श्री रामकृष्ण वचनामृत से
मंगलवार, दिसंबर 20, 2011
श्री रामकृष्ण - [नरेन्द्र { बाद में स्वामी विवेकानंद} से] - "क्यों नरेन्द्र, भला तू क्या कहेगा ? संसारी मनुष्य तो न जाने क्या क्या कहते हैं। पर याद रहे कि हाथी जब जाता है, तब उसके पीछे पीछे कितने ही जानवर बेतरह चिल्लाते हैं। पर हाथी लौटकर देखता तक नहीं। तेरी कोई निंदा करे तो तू क्या समझेगा?
नरेन्द्र - मै तो यह समझूंगा कि कुत्ते भोंकते हैं।
श्री रामकृष्ण (सहास्य) - अरे नहीं, यहाँ तक नहीं। ( सब का हास्य) सर्व भूतों में परमात्मा का ही वास है। पर मेल मिलाप करना हो तो भले आदमियों से ही करना चाहिए, बुरे आदमियों से अलग ही रहना चाहिए। बाघ में भी परमात्मा का वास है, इसलिए क्या बाघ को भी गले लगाना चाहिए ? ( लोग हंस पड़े।)
- रामकृष्ण वचनामृत से
मास्टर को कमरे में घुसता देख श्री रामकृष्ण ने हँसते हुए कहा, " यह देखो, फिर आया।" सब हंसने लगे।
मास्टर ने भूमिष्ठ होकर प्रणाम करके आसन ग्रहण किया। ...श्री रामकृष्ण नरेन्द्र आदि भक्तों से कहने लगे,
" देखो, एक मोर को किसी ने चार बजे अफीम खिला दी। दूसरे दिन से वह अफीमची मोर ठीक चार बजे आ जाता था ! यह भी अपने समय पर आया है।" सब लोग हंसने लगे।
-रामकृष्ण वचनामृत से
मिठाई पा चुकने के बाद आप हँसते हुए विद्यासागर से बातचीत कर रहे हैं।
( स्थान: ईश्वरचंद्र विद्यासागर का घर )
श्री रामकृष्ण - "आज सागर से आ मिला। इतने दिन खाई, सोता और अधिक से अधिक हुआ तो नदी देखी, पर अब 'सागर' देख रहा हूँ।" ( सब हँसते हैं।)
विद्यासागर- ' तो थोडा खारा पानी लेते जाइये।' (हास्य)
श्री रामकृष्ण - "नहीं जी, खारा पानी क्यों ? तुम तो अविद्या के सागर नहीं विद्या के सागर हो। ( सब हँसे।)
तुम क्षीर समुद्र हो।" ( सब हँसे।)
- श्री रामकृष्ण वचनामृत से
श्री रामकृष्ण मिठाई के ताक के पास खड़े हैं। बलराम और मास्टर कलकत्ता से एक ही गाड़ी से चढ़ कर आये हैं और प्रणाम कर रहे हैं। प्रणाम करके बैठने पर श्री रामकृष्ण हंसते हुए कहने लगे, " ताक पर से कुछ मिठाई लेने गया था कि एक छिपकली बोल उठी, तुरंत हाथ हटा लिया! ( सब हँसे।)
यह सब मानना चाहिए। देखो न राखाल बीमार पड़ गया ; मेरे भी हाथ पैर में दर्द हो रहा है। क्या हुआ, सुनो। सुबह को मैंने उठते ही , राखाल आ रहा है सोच के अमुक का मुख देख लिया था। ( सब हँसते हैं।)
-रामकृष्ण वचनामृत से
शुक्रवार, दिसंबर 16, 2011
श्री रामकृष्ण - "दर्शन के बाद कभी कभी भक्त की साध होती है कि उनकी लीला देखें।
श्री रामचंद्र जी जब राक्षसों को मारकर लंकापुरी में घुसे तो बुड्ढी निकषा भागी। तब लक्ष्मण बोले, ' हे राम , भला यह क्या है ? यह निकषा इतनी बुड्ढी है, पुत्र शोक भी इसको कम नहीं हुआ, फिर भी इसे प्राणों का इतना भय है कि भाग रही है ! ' श्री रामचंद्र जी ने निकषा को अभय देते हुए सामने लाकर कारण पूछा। वह बोली, ' राम इतने दिनों तक बची हूँ, इसीलिए तुम्हारी इतनी लीला देखी। यहीं कारण है कि और भी बचना चाहती हूँ। न जाने और कितनी लीलाएं देखूं ! ' " ( सब हंसते हैं।)
-श्री रामकृष्ण वचनामृत से
बलराम - " अब विश्वास बाबू की साधू संग करने की इच्छा है।
श्री रामकृष्ण -( हंसते हुए ) - " साधू का कमण्डलु चार धाम घूमकर आता है, परन्तु वैसा ही कडुआ का कडुआ रहता है। मलय की हवा जिन पेड़ो लगती है वे चन्दन हो जाते हैं, परन्तु सेमल , बड़ आदि चन्दन नहीं बनते ! कोई कोई साधू संग करते हैं गांजा पीने के लिए ! ( हंसी) साधू लोग गांजा पीते हैं इसीलिए उनके पास आकर बैठते हैं, गांजा तैयार कर देतें हैं और प्रसाद पाते हैं ! ( सब हंसते हैं। )
- श्री रामकृष्ण वचनामृत से
बुधवार, दिसंबर 14, 2011
श्री रामकृष्ण - ( केशव चन्द्र सेन से , केशव के घर पर ) - ".......तुम सोचते हो कि बस, सब मामला तय है। परन्तु जब तक रोग की कुछ कसर रहेगी, तब तक वे तुम्हे नहीं छोड़ सकते। अगर तुम अस्पताल में नाम लिखाओ तो तुम्हे चले आने का अधिकार नहीं है। जब तक रोग में कोई त्रुटि पाई जाएगी तब तक डाक्टर साहब तुम्हे आने नहीं देंगे। तुमने नाम क्यों लिखाया ? " ( सब हंसते हैं। )
गंभीर भाव से ये बातें कह कर श्री रामकृष्ण फिर बालक की तरह हंसने लगे। केशव से कह रहे हैं ,' देखूं , तुम्हारा हाथ देखूं। बालक की तरह हाथ लेकर मानो तौल रहे हैं। अंत में कहने लगे, " नहीं, तुम्हारा हाथ हल्का है, खलों का हाथ भारी होता है।" ( सब हँसते हैं।)
गंभीर भाव से ये बातें कह कर श्री रामकृष्ण फिर बालक की तरह हंसने लगे। केशव से कह रहे हैं ,' देखूं , तुम्हारा हाथ देखूं। बालक की तरह हाथ लेकर मानो तौल रहे हैं। अंत में कहने लगे, " नहीं, तुम्हारा हाथ हल्का है, खलों का हाथ भारी होता है।" ( सब हँसते हैं।)
- श्री रामकृष्ण वचनामृत से
श्री रामकृष्ण - "वासना के रहे बिना शरीर धारण नहीं हो सकता। (सहास्य) मुझे भी दो एक इच्छाएं थी। मैंने कहा था , ' माँ , कामिनी कांचन त्यागियों का सत्संग मुझे दो। और ज्ञानी और भक्तों का सत्संग करूँगा। अतएव कुछ शक्ति भी दे दे , जिससे कुछ चल सकूँ - यहाँ -वहां जा सकूँ।' परन्तु उसने चलने की शक्ति नहीं दी। "
त्रैलोक्य (सहास्य) - साध मिटी ?
श्री रामकृष्ण -(सहास्य) - कुछ बाकी है। ( सब हँसते हैं.)
त्रैलोक्य (सहास्य) - साध मिटी ?
श्री रामकृष्ण -(सहास्य) - कुछ बाकी है। ( सब हँसते हैं.)
- श्री रामकृष्ण वचनामृत से
शनिवार, दिसंबर 10, 2011
श्री रामकृष्ण -(सहास्य)- " ....... और यहाँ आकर कुछ पूजा भी नहीं चढानी पड़ती। यदु की माँ ने इस पर कहा - दूसरे साधू बस लाओ लाओ किया करते हैं। बाबा , तुममे यह बात नहीं है। " विषयी आदमियों का जी ही निकल आता है अगर उन्हें गांठ का पैसा खर्च करना पड़े।
एक जगह नाटक हो रहा था । एक आदमी को बैठकर सुनने की बड़ी इच्छा थी। उसने झांककर देखा, तो मालूम हुआ कि यदि कोई बैठकर देखना चाहता है तो उससे टिकिट के दाम लिए जाते हैं , फिर क्या था , वहां से चलता बना। एक दूसरी जगह नाटक हो रहा था , वह वहां गया। पूछने पर मालूम हुआ, वहां टिकिट नहीं लगता । वहां बड़ी भीड़ थी। वह दोनों हाथों से भीड़ को हटाकर बीच महफ़िल में पहुंचा। वहां अच्छी तरह जमकर मूंछों पर ताव दे देकर सुनने लगा। (सब हँसते हैं)
एक जगह नाटक हो रहा था । एक आदमी को बैठकर सुनने की बड़ी इच्छा थी। उसने झांककर देखा, तो मालूम हुआ कि यदि कोई बैठकर देखना चाहता है तो उससे टिकिट के दाम लिए जाते हैं , फिर क्या था , वहां से चलता बना। एक दूसरी जगह नाटक हो रहा था , वह वहां गया। पूछने पर मालूम हुआ, वहां टिकिट नहीं लगता । वहां बड़ी भीड़ थी। वह दोनों हाथों से भीड़ को हटाकर बीच महफ़िल में पहुंचा। वहां अच्छी तरह जमकर मूंछों पर ताव दे देकर सुनने लगा। (सब हँसते हैं)
- श्री रामकृष्ण वचनामृत से
आओ मन को खोलें -
कुछ बोलें ।
घनीभूत पीड़ा का संग्रह
कब तक कर पाओगे
अपना अंतरगान कब तक
स्वर बिना गाओगे ,
जीवन के सुख दुःख को अपने
मन के पलड़े में तोलें
आओ खुश हो ले !
तृश्नाऍ उठती रही
ज्यों सागर की लहर
कर्म भूमि में जुटे रहे हम
बीते जीवन के कई पहर ,
अब कुछ क्षण तो नयन मूंदकर
स्वप्न वीथिका में डोलें -
आओ कुछ सो ले !
मन में उठती हूक दबाकर
मुस्काने ओढे
रहे
रहे
लिपटे झूंठे आडम्बर में
'अपने ' को छोड़े रहे,
मन का गहन विषाद अपने
अश्रुओ से धो ले-
आओ कुछ ........
सोमवार, दिसंबर 05, 2011
श्री रामकृष्ण- उसकी ( नारायण की) माँ उस दिन आई थी। अभिमानिनी थी, देख कर भय हुआ। ...मुझसे कहा, 'आप नारायण से कहिये जिससे विवाह करे।' इस बात पर मैंने कहा, ये सब भाग्य की बातें हैं। क्यों मैं ऐसी बात के लिए जोर दूँ ? ( सब हंसते हैं)
"नारायण अच्छी तरह पढने में जी नहीं लगाता, इस पर उसने कहा ,आप कहिये, जरा अच्छी तरह पढे। मैंने कहा, पढना रे ! तब उसने कहा , 'जरा अच्छी तरह कहिये।' ( सब हंसते हैं)
- रामकृष्ण वचनामृत से
3.4.1992
" ये कौन झाँक रहा है अम्बर के पीछे से, धरती के नीचे से ।
ये कौन विद्यमान है, यहाँ और वहाँ।
ये कौन कर रहा है, जीवन और मृत्यु की क्रीडा,
ये कौन बाँटता फिरता सुख और पीड़ा ।
ये कौन गा रहा है, अनंत काल से
ये कौन जा रहा है निर्भय चाल से ।
ये कौन बनाता मोहरे हमको, अपने,
ये कौन दिखाता सुन्दर सुखमय सपने ।
ये है कौन , कहाँ से आता ,
प्रलय पलों में भी , जीवन गाथा गाता ।
ये कौन सृष्टि का अद्भुत रचनाकार है,
पत्थर से मानव तक, फैला जिसका विस्तार है।
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" ये कौन झाँक रहा है अम्बर के पीछे से, धरती के नीचे से ।
ये कौन विद्यमान है, यहाँ और वहाँ।
ये कौन कर रहा है, जीवन और मृत्यु की क्रीडा,
ये कौन बाँटता फिरता सुख और पीड़ा ।
ये कौन गा रहा है, अनंत काल से
ये कौन जा रहा है निर्भय चाल से ।
ये कौन बनाता मोहरे हमको, अपने,
ये कौन दिखाता सुन्दर सुखमय सपने ।
ये है कौन , कहाँ से आता ,
प्रलय पलों में भी , जीवन गाथा गाता ।
ये कौन सृष्टि का अद्भुत रचनाकार है,
पत्थर से मानव तक, फैला जिसका विस्तार है।
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शनिवार, दिसंबर 03, 2011
श्री रामकृष्ण - "....मान लिया कि नाम से जीव एक बार शुद्ध हुआ, पर वह फिर तरह तरह के पापों में लिप्त हो जाता है। मन में बल नहीं; वह प्रण नहीं करता कि फिर पाप नहीं करूँगा। गंगा स्नान से सब पाप मिट जाते हैं सही, पर सब लोग कहते हैं कि वे पाप एक पेड़ पर चढ़े रहते हैं। जब वह मनुष्य गंगाजी से नहा कर लौटता है, तो वे पुराने पाप पेड़ पर से कूद कर फिर उसके सिर पर सवार हो जाते हैं।" ( सब हँसे। )
-रामकृष्ण वचनामृत से
20.3.1997
20.3. 2000-3
'चुप रहना एक बात है और शांति पाना दूसरी। चुप्पी कि कोख से शांति का सृजन नहीं होता।
कलम इस समय चुप है। लिखने का औचित्य इन दिनों ज्ञात नहीं हो पा रहा। प्रश्न ही उठता है बार बार, क्यों लिखूं मैं ? फिर स्वयं की अल्पज्ञता का भी भान होता है। लिखने का सार क्या है? और बात सिर्फ लिखने की ही नहीं है, बात इस पूरे जीवन की ही है। क्या है सार? विचारो ने पंक्तिबद्ध रहना छोड़ दिया है। वे "एक के ऊपर एक गिरते हैं "। इसका एक ही परिणाम हो सकता है कि कलम की जुबान बंद रहे ; और जब स्वर ही नहीं निकलेंगे तो , वायु तो बहती रहे अनवरत, वाणी कहाँ से आयेगी।
इस कलम को एक और रख देने की इच्छा होती है। मन के सागर में होने वाली हलचलों को व्यक्त करने में यह समर्थ नहीं लगती। एक भिक्षुक रोज भिक्षा लेने आता है। वह आवाज लगाता है ,' जै हो, शंकर की माया', और शंकर भगवान क्या कहते हैं, ' उमा दारुयोशित की नाइ -सबही नचावत राम गुसाईं' । सूरदास जी कहते है, ' अब मैं बहुत नाच्यो गोपाल...'.............."
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