श्री रामकृष्ण झाऊतल्ले की ओर जाते समय सींती के गोपाल से छाते के बारे में कह गए हैं।
श्री रामकृष्ण - ( सींती के गोपाल से ) - क्यों जी , छाता ले आये हो ?
गोपाल - जी नहीं, गाना सुनते ही सुनते भूल गया।
छाता पंचवटी में पड़ा हुआ है, गोपाल जल्दी से लेने के लिए चले गए।
श्री रामकृष्ण - मैं इतना लापरवाह तो हूँ फिर भी इस दर्जे को अभी नहीं पहुंचा। राखाल ने एक जगह निमंत्रण कि बात पर 13 तारीख को कह दिया 11 तारीख। ओर गोपाल आखिर गोओं के पाल (समूह) ही तो है ! ( सब हंसते हैं।)
- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से
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