वृद्धावस्था बाघिन के समान सामने खड़ी दहाड़ रही है, अनेक रोग शत्रु की तरह इस शरीर पर चोटें कर रहे हैं, आयु भी फूटे घड़े से रिसने वाले जल की तरह प्रतिदिन घटती जा रही है; फिर भी मनुष्य ऐसे कर्म करते हैं, जो उनके लिए सर्वथा अहितकारी है। क्या यह बड़े आश्चर्य की बात नहीं है ?
- भृतहरि कृत वैराग्यशतकम
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