श्री रामकृष्ण - ......लक्ष्मी नारायण मारवाड़ी था, प्राय: यहाँ आया करता था। मेरा मैला बिस्तर देख कर उसने कहा, मैं आपके नाम दस हजार रूपये लिख दूंगा, उसके ब्याज से आपकी सेवा होती रहेगी।' उसने यह बात कही नहीं कि मैं जैसे लाठी की चोट खाकर बेहोश हो गया। होश आने पर उससे कहा, " तुम्हे अगर ऐसी बातें करनी हो, तो यहाँ फिर कभी न आना। मुझमे रुपया छूने कि शक्ति ही नहीं है और न मैं रुपया पास ही रख सकता हूँ।" उसकी बुद्धि बड़ी सूक्ष्म थी। उसने कहा, ' तो अब भी आपके लिए त्याज्य और गाह्य है। तो आपको अभी ज्ञान नहीं हुआ।' मैंने कहा, "नहीं भाई, इतना ज्ञान मुझे नहीं हुआ !" ( सब हंसते हैं।)
- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से
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