श्री रामकृष्ण - "संन्यासी जितेन्द्रिय होने पर भी लोक-शिक्षा के लिए स्त्रियों के साथ उसे बातचीत न करनी चाहिए। भक्त स्त्री होने पर भी उससे ज्यादा देर बातचीत न करे। संन्यासी की है निर्जला एकादशी। एकादशी और दो तरह की है। एक फल -मूल खाकर रखी जाती है , एक पुडी कचोरी और मालपुए खाकर।" ( सब हंसते हैं।)
"कभी तो ऐसा भी होता है कि उधर पुड़ियाँ उड़ रही है और इधर दूध में रोटियां भी भीग रही है, फिर खायेंगे ! " ( सब हंसते हैं।)
(हंसते हुए )" तुम लोग निर्जला एकादशी न रख सकोगे।"
कृष्ण किशोर को मैंने देखा, एकादशी के दिन पुड़ियाँ और पकवान उड़ा रहे थे। मैंने हृदय से कहा, 'हृदय मेरी भी इच्छा होती है कि मैं भी कृष्ण किशोर की एकादशी रखूं।' ( सब हंसते हैं।)
एक दिन ऐसा ही किया भी। खूब कसकर खाया। परन्तु उसके दूसरे दिन फिर कुछ न खाया गया।" ( सब हंसते हैं।)
-रामकृष्ण वचनामृत से
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