6.12.1994
'प्यारे कंप्यूटर , मैं जानता हूँ कि तुम जटिल से जटिल , उलझी हुई विस्तृत समस्याओं के समाधान में माहिर हो, पर ओ प्रिय , बुरा न मानना यदि मैं तुम्हे मानव मन से जुडी समस्याओं के बारे में नादान ही मानूं। ओ इक्कीसवी सदी में धरा पर आदमियों की तरह छा जाने वाले कंप्यूटर , तुम्हारी सर्वोत्तम किस्म भी इनके आगे तो त्राहि माम- त्राहि माम करने लगेगी। परन्तु देखो, कि इस स्थिति में भी आदमी किस जीवटता से जीवन के प्रोग्राम को आखिरी परिणाम प्रिंट-आउट ( मृत्यु) होने तक चलाये जाता है।
ये वो प्रोग्राम होते हैं जिनकी प्रोग्रामिंग प्रारब्ध व कर्म मिलकर इतनी सूक्ष्मता से करते हैं कि यदि इसे एक परमाणु माने तो तुम्हारे प्रोग्रामों को ब्रह्मांड मानना पड़ेगा !
कम्यूटर , जश्न मनाओ कि तुम्हे उन दुविधाओं से रंच मात्र भी नहीं गुजरना पड़ता जिनमे होकर जाना आदमी के लिए अपरिहार्य है। कोई दुविधा सामने आ भी गई , तो तुम साफ कह देते हो, यह मेरे बस का नहीं । पर आदमी को इतनी छूट भी कहाँ।
कंप्यूटर क्या ठाट है तुम्हारे। तुमको सामाजिक बन्धनों कि तो कल्पना भी नहीं। और भले ही तुम पांचवी पीढ़ी के हो, पर तुम्हारे यहाँ पीढ़ियों में टकराव कहाँ देखने को मिलता है।
परन्तु फिर भी कंप्यूटर मुझे तुमसे सहानुभूति है। क्योंकि मैं देखता हूँ कि इस जीवन को जो भले ही कष्टों से परिपूर्ण है, बाधाओं से अटा पड़ा है, थोड़े सुखों और ज्यादा दुखों: का सागर है, पर देवता भी जिसके लिए तरसते है; तुम क्षण भर भी महसूस नहीं कर पाते। इसलिए, प्रिय कंप्यूटर, मुझे तुमसे सहानुभूति है। '
'प्यारे कंप्यूटर , मैं जानता हूँ कि तुम जटिल से जटिल , उलझी हुई विस्तृत समस्याओं के समाधान में माहिर हो, पर ओ प्रिय , बुरा न मानना यदि मैं तुम्हे मानव मन से जुडी समस्याओं के बारे में नादान ही मानूं। ओ इक्कीसवी सदी में धरा पर आदमियों की तरह छा जाने वाले कंप्यूटर , तुम्हारी सर्वोत्तम किस्म भी इनके आगे तो त्राहि माम- त्राहि माम करने लगेगी। परन्तु देखो, कि इस स्थिति में भी आदमी किस जीवटता से जीवन के प्रोग्राम को आखिरी परिणाम प्रिंट-आउट ( मृत्यु) होने तक चलाये जाता है।
ये वो प्रोग्राम होते हैं जिनकी प्रोग्रामिंग प्रारब्ध व कर्म मिलकर इतनी सूक्ष्मता से करते हैं कि यदि इसे एक परमाणु माने तो तुम्हारे प्रोग्रामों को ब्रह्मांड मानना पड़ेगा !
कम्यूटर , जश्न मनाओ कि तुम्हे उन दुविधाओं से रंच मात्र भी नहीं गुजरना पड़ता जिनमे होकर जाना आदमी के लिए अपरिहार्य है। कोई दुविधा सामने आ भी गई , तो तुम साफ कह देते हो, यह मेरे बस का नहीं । पर आदमी को इतनी छूट भी कहाँ।
कंप्यूटर क्या ठाट है तुम्हारे। तुमको सामाजिक बन्धनों कि तो कल्पना भी नहीं। और भले ही तुम पांचवी पीढ़ी के हो, पर तुम्हारे यहाँ पीढ़ियों में टकराव कहाँ देखने को मिलता है।
परन्तु फिर भी कंप्यूटर मुझे तुमसे सहानुभूति है। क्योंकि मैं देखता हूँ कि इस जीवन को जो भले ही कष्टों से परिपूर्ण है, बाधाओं से अटा पड़ा है, थोड़े सुखों और ज्यादा दुखों: का सागर है, पर देवता भी जिसके लिए तरसते है; तुम क्षण भर भी महसूस नहीं कर पाते। इसलिए, प्रिय कंप्यूटर, मुझे तुमसे सहानुभूति है। '
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