श्री रामकृष्ण - " देखो विजय, साधू के साथ अगर बोरिया-बिस्तर रहे, कपडे की पंद्रह गिरह वाली गठरी रहे, तो उस पर विश्वास न करना। मैंने बटतल्ले में ऐसे साधू देखे थे। दो-तीन बैठे हुए थे। कोई दाल के कंकड़ चुन रहा था, कोई कपडा सी रहा था और कोई बड़े आदमी के घर के भंडारे की गप्प लड़ा रहा था, ' अरे उस बाबू ने लाखों रूपये खर्च किये, साधुओ को खूब खिलाया - पुड़ी, जलेबी, पेडा , बर्फी , मालपुआ , बहुत सी चीजें तैयार करायी।' "( सब हँसते हैं।)
-श्रीरामकृष्ण वचनामृत से
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