२८.४.१९९५
' क्यों भई ढाई अक्षर वाला पाठ ठीक तरह पढ़ लिया ना ?
हाँ हाँ बिलकुल पढ़ लिया।
' वाह ! अब प्रेम की लताएँ धरती से आकाश तक जा पहुंचेगी। '
' प्रेम ? मैंने तो घृणा का पाठ पढ़ा है.'
'ओह ! यह क्या हो गया। '
दोनों ने ही ढाई अक्षर बोले । एक ने कहा प्रेम, दूसरे ने कहा घृणा। आदमी के मानसिक धरातल पर कब ढाई अक्षर का झांसा देकर प्रेम की जगह घृणा की फसल लहलहाने लगती है ? ....
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