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सोमवार, जनवरी 30, 2012

श्री रामकृष्ण - " देखो विजय, साधू के साथ अगर बोरिया-बिस्तर रहे, कपडे की पंद्रह गिरह वाली गठरी रहे, तो उस पर विश्वास न करना। मैंने बटतल्ले में ऐसे साधू देखे थे। दो-तीन बैठे हुए थे। कोई दाल के कंकड़ चुन रहा था, कोई कपडा सी रहा था और कोई बड़े आदमी के घर के भंडारे की गप्प लड़ा रहा था, ' अरे उस बाबू ने लाखों रूपये खर्च किये, साधुओ को खूब खिलाया - पुड़ी, जलेबी, पेडा , बर्फी , मालपुआ , बहुत सी चीजें तैयार करायी।' "

( सब हँसते हैं।)

-श्रीरामकृष्ण वचनामृत से

शुक्रवार, जनवरी 27, 2012

श्री रामकृष्ण - ( मास्टर आदि भक्तों के प्रति ) - विद्वेष भाव अच्छा नहीं - शाक्त , वैष्णव, वेदान्ती ये सब झगडा करते हैं, यह ठीक नहीं। पद्मलोचन बर्दवान के सभा पंडित थे। सभा में विचार हो रहा था - ' शिव बड़े हैं या ब्रह्मा ', पद्मलोचन ने बहुत सुन्दर बात कही थी- " मैं नहीं जानता, मुझसे न शिव का परिचय है, और न ब्रह्मा का !"


( सभी हँसने लगे।)

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से

श्री रामकृष्ण - " .... सुना है कि श्रीमद्भाग्वद जैसे ग्रन्थ में भी इस तरह की बातें है। 'केशव का मंत्र बिना लिए भव सागर पार जाना कुत्ते की पूंछ पकड़ कर महासमुद्र पार करना है।' भिन्न भिन्न मत वालों ने अपने ही मत को प्रधान बतलाया है।


" शाक्त भी वैष्णवों को छोटा सिद्ध करने कि चेष्टा करते हैं। श्री कृष्ण भव नदी के नाविक है, पार कर देते हैं, इस पर शाक्त लोग कहते हैं - 'हाँ, यह बिलकुल ठीक है, क्योंकि हमारी माँ राजराजेश्वरी है, भला वे कभी खुद आकर पार कर सकती है " - कृष्ण को पार करने के लिए नौकर रख लिया है। '


( सब हंसते हैं।)

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से

श्री रामकृष्ण - " क्या तुम्हारा विवाह हो गया है ? कोई बाल बच्चे हैं

विद्या ( नाटक कंपनी में काम करने वाला नट) - जी, एक लड़की का देहान्त हो गया है, फिर एक संतान हुई है।

श्री रामकृष्ण - इसी बीच में हुआ और मर भी गया। तुम्हारी यह कम उम्र ! कहते हैं - ' संध्या के समय पति मरा, कितनी रात तक रोउंगी !' ( सभी हंस पड़े।)

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से
श्री रामकृष्ण चैतन्य लीला देखने जायेंगे, इसी सम्बन्ध में बातचीत हो रही है।

श्री रामकृष्ण ( हंसते हुए) - "यदु ने कहा था ,' एक रूपये वाली जगह से खूब दिख पड़ता है और सस्ता भी है !' "

" एक बार हम लोगों को पेनेटी ले जाने की बात हुई थी, यदु ने हम लोगों के चढ़ने के लिए चलती नाव किराये पर लेने की बातचीत की थी !" ( सब हंसते हैं।)

" बड़ा हिसाबी है। जाने के साथ ही उसने पूछा , 'कितना किराया है ?' मैंने कहा, ' तुम्हारा न सुनना ही अच्छा है, तुम ढाई रूपये देना।' इससे चुप हो गया और वहीँ ढाई रूपये देता है। ( सब हंसते हैं।)

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से


श्री रामकृष्ण - " ...........जिसकी जैसी प्रवृत्ति , जिसका जैसा भाव वह उसे ही लेकर रहता है।"

" किसी धार्मिक मेले में अनेक तरह की मूर्तियाँ पाई जाती है, और वहां अनेक मतों के आदमी जाते हैं। राधा-कृष्ण, हर-पार्वती, सीता-राम, जगह जगह पर भिन्न भिन्न मूर्तियाँ रखी रहती है। और हर एक मूर्ति के पास लोगों की भीड़ होती है। जो लोग वैष्णव है उनकी अधिक संख्या राधा-कृष्ण के पास खड़ी हुई है, जो शाक्त हैं उनकी भीड़ हर-पार्वती के पास लगी है। जो राम भक्त हैं वे सीता-राम की मूर्ति के पास खड़े हुए हैं।

परन्तु जिनका मन किसी देवता की ओर नहीं है, उनकी और बात है। वेश्या अपने आशिक की झाड़ू से खबर ले रही है, ऐसी मूर्ति भी वहां बनाई जाती है। उस तरह के आदमी मुहं फैलाये हुए वहीँ मूर्ति देखते और अपने मित्रों को चिल्लाते हुए उधर ही बुलाते भी हैं, कहते हैं, ' अरे वह सब क्या खाक देखते हो ? इधर आओ जरा, यहाँ तो देखो !' "

सब हंस रहे हैं, गोस्वामी प्रणाम करके बिदा हुए।


- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से

बुधवार, जनवरी 25, 2012

श्री 'म' अर्थात मास्टर महाशय का वह कमरा जिसमे उन्होंने अपनी डायरी से "रामकृष्ण वचनामृत" कॉपी किया।

Photo by : Swami Sharan Verma
इस संसार में प्राप्ति क्या है ? - गुणीजनों का संग।

दुःखकर क्या है ? - मूर्खों की संगति।

हानि क्या है ? - समय चूक जाना।

निपुणता क्या है ? - धर्म तत्त्व में अभिरुचि ।

सच्चा वीर कौन है ? - जिसने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया है।

प्रियतमा कौन है ? - अनुकूल आचरण करने वाली।

धन क्या है ? - विद्या।

सुख क्या है ? - परदेश न जाना।

राज्य क्या है ? - आज्ञा पालित होना।

- भ्रृर्तहरि कृत नीति शतकम् 103
6.12.1994
'प्यारे कंप्यूटर , मैं जानता हूँ कि तुम जटिल से जटिल , उलझी हुई विस्तृत समस्याओं के समाधान में माहिर हो, पर ओ प्रिय , बुरा न मानना यदि मैं तुम्हे मानव मन से जुडी समस्याओं के बारे में नादान ही मानूं। ओ इक्कीसवी सदी में धरा पर आदमियों की तरह छा जाने वाले कंप्यूटर , तुम्हारी सर्वोत्तम किस्म भी इनके आगे तो त्राहि माम- त्राहि माम करने लगेगी। परन्तु देखो, कि इस स्थिति में भी आदमी किस जीवटता से जीवन के प्रोग्राम को आखिरी परिणाम प्रिंट-आउट ( मृत्यु) होने तक चलाये जाता है।
ये वो प्रोग्राम होते हैं जिनकी प्रोग्रामिंग प्रारब्ध व कर्म मिलकर इतनी सूक्ष्मता से करते हैं कि यदि इसे एक परमाणु माने तो तुम्हारे प्रोग्रामों को ब्रह्मांड मानना पड़ेगा !
कम्यूटर , जश्न मनाओ कि तुम्हे उन दुविधाओं से रंच मात्र भी नहीं गुजरना पड़ता जिनमे होकर जाना आदमी के लिए अपरिहार्य है। कोई दुविधा सामने आ भी गई , तो तुम साफ कह देते हो, यह मेरे बस का नहीं । पर आदमी को इतनी छूट भी कहाँ।
कंप्यूटर क्या ठाट है तुम्हारे। तुमको सामाजिक बन्धनों कि तो कल्पना भी नहीं। और भले ही तुम पांचवी पीढ़ी के हो, पर तुम्हारे यहाँ पीढ़ियों में टकराव कहाँ देखने को मिलता है।
परन्तु फिर भी कंप्यूटर मुझे तुमसे सहानुभूति है। क्योंकि मैं देखता हूँ कि इस जीवन को जो भले ही कष्टों से परिपूर्ण है, बाधाओं से अटा पड़ा है, थोड़े सुखों और ज्यादा दुखों: का सागर है, पर देवता भी जिसके लिए तरसते है; तुम क्षण भर भी महसूस नहीं कर पाते। इसलिए, प्रिय कंप्यूटर, मुझे तुमसे सहानुभूति है। '
.... संतोषी है इसलिए सुखी है। महत्त्वाकांक्षाओ को दूर से ही नमन कर लिया है।
पृथ्वी को ही मिला है , फलो - फूलो का आशीर्वाद । अन्य ग्रहों ने शायद नहीं किया, सच्चे मन से सृष्टिकर्ता को प्रणाम !

सोमवार, जनवरी 23, 2012

श्री रामकृष्ण - ......लक्ष्मी नारायण मारवाड़ी था, प्राय: यहाँ आया करता था। मेरा मैला बिस्तर देख कर उसने कहा, मैं आपके नाम दस हजार रूपये लिख दूंगा, उसके ब्याज से आपकी सेवा होती रहेगी।' उसने यह बात कही नहीं कि मैं जैसे लाठी की चोट खाकर बेहोश हो गया। होश आने पर उससे कहा, " तुम्हे अगर ऐसी बातें करनी हो, तो यहाँ फिर कभी न आना। मुझमे रुपया छूने कि शक्ति ही नहीं है और न मैं रुपया पास ही रख सकता हूँ।" उसकी बुद्धि बड़ी सूक्ष्म थी। उसने कहा, ' तो अब भी आपके लिए त्याज्य और गाह्य है। तो आपको अभी ज्ञान नहीं हुआ।' मैंने कहा, "नहीं भाई, इतना ज्ञान मुझे नहीं हुआ !" ( सब हंसते हैं।)


- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से
श्री रामकृष्ण (ईशान के प्रति) - अपनी वह कहानी कहो तो - बालक ने पत्र भेजा था।
ईशान ( हंसकर) - एक बालक ने सुना कि ईश्वर ने हमें पैदा किया है। इसलिए उसने अपनी प्रार्थना जताने के लिए ईश्वर के नाम पर एक पत्र लिख कर लेटरबॉक्स में डाल दिया। पता लिखा था - स्वर्ग ! ( सभी हँसे)
श्री रामकृष्ण (हंसते हुए) - देखा ! इसी बालक की तरह विश्वास चाहिए। तब होता है।

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से

गुरुवार, जनवरी 19, 2012

श्री रामकृष्ण - सभी मनुष्य दिखने में एक सरीखे हैं, पर हर एक का स्वभाव भिन्न है। किसी के भीतर सत्त्व गुण अधिक है, किसी के भीतर रजोगुण तो किसी के भीतर तमोगुण। गुझिया बाहर से एक जैसी दिखाई देती है पर किसी के भीतर खोया, किसी के भीतर नारियल तो किसी के भीतर उड़द की दाल होती है। ( सब हंसते हैं।)


- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से
श्री रामकृष्ण ( केशव के प्रति ) - अजी, ये विजय आये हैं। तुम लोगों का झगडा विवाद मानो शिव और राम की लड़ाई है। राम के गुरु शिव है। दोनों में युद्ध भी हुआ, फिर संधि भी हो गई। पर शिव के भूत-प्रेत और राम के बन्दर ऐसे थे कि उनका झगड़ना - किचकिचाना रुकता ही न था। ( सब जोर से हंस पड़े।)

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से
श्री रामकृष्ण - ......अतएव अच्छे बुरे सभी लोग चाहिए। सीताजी बोली, ' राम यदि अयोध्या में सभी सुन्दर महल होते तो कैसा अच्छा होता ! मैं देख रही हूँ अनेक मकान टूट गए हैं, कुछ पुराने हो गए हैं।' श्री राम बोले , ' सीता, यदि सभी मकान सुन्दर हो तो मिस्त्री लोग क्या करेंगे ? ' ( सभी हंस पड़े।)

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से

बुधवार, जनवरी 18, 2012

श्री रामकृष्ण झाऊतल्ले की ओर जाते समय सींती के गोपाल से छाते के बारे में कह गए हैं।

श्री रामकृष्ण - ( सींती के गोपाल से ) - क्यों जी , छाता ले आये हो ?

गोपाल - जी नहीं, गाना सुनते ही सुनते भूल गया।

छाता पंचवटी में पड़ा हुआ है, गोपाल जल्दी से लेने के लिए चले गए।

श्री रामकृष्ण - मैं इतना लापरवाह तो हूँ फिर भी इस दर्जे को अभी नहीं पहुंचा। राखाल ने एक जगह निमंत्रण कि बात पर 13 तारीख को कह दिया 11 तारीख। ओर गोपाल आखिर गोओं के पाल (समूह) ही तो है ! ( सब हंसते हैं।)

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से
(सुरेन्द्र के बगीचे में ) समय बहुत हो गया है, परन्तु भोजन अदि का बंदोबस्त अभी तक नहीं हुआ। श्री रामकृष्ण बालक स्वभाव है। कहा, " क्यों जी , अभी तक कुछ देता क्यों नहीं ? नरेन्द्र कहाँ है ?

एक भक्त - ( श्री रामकृष्ण के प्रति सहास्य)- महाराज, अध्यक्ष रामबाबू है, वे ही सब देखभाल करते हैं। ( सब हंसते हैं।)

श्री रामकृष्ण - ( हंसते हुए) - राम अध्यक्ष है; तब तो हो चुका !

एक भक्त - जी रामबाबू जहाँ अध्यक्ष होते हैं, वहां प्राय: यहीं हाल हुआ करता है ! ( सब हंसते हैं।)


- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से
श्री रामकृष्ण ( राम के प्रति ) - राम तुम कहाँ थे ?

राम- जी, ऊपर था।

(श्री रामकृष्ण तथा भक्तों की सेवा के लिए राम ऊपर प्रबंध करने गए थे। )

श्री रामकृष्ण - ( राम से , सहास्य) - ऊपर रहने की अपेक्षा क्या नीचे रहना अच्छा नहीं ? नीची जमीन में ही पानी ठहरता है। ऊँची जमीन से पानी बह जाता है।

राम - ( हँसते हुए) - जी हाँ।

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से
श्री रामकृष्ण ( विद्यासागर से, सहास्य ) - यह सब जो कहा, वह तो ऐसे ही कहा। आप सब जानते हैं, किन्तु अभी आपको इसकी खबर नहीं। ( सब हँसे।) वरुण के भंडार में कितने ही रत्न पड़े हैं, परन्तु वरुण महाराज को कोई खबर नहीं।

विद्यासागर ( हंसते हुए)- यह आप कह सकते हैं।

श्री रामकृष्ण - (सहास्य)- हाँ जी, अनेक बाबू नौकरों के नाम तक नहीं जानते ! ( सब हंसते हैं।) घर में कहाँ कौनसी कीमती चीज पड़ी है, वे नहीं जानते ।

वार्तालाप सुनकर लोग आनंदित हो रहे हैं।

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से



बुधवार, जनवरी 11, 2012

महिमाचरण - (श्री रामकृष्ण से सहास्य) - महाराज, आपसे एक निवेदन है, आपने हाजरा को घर जाने के लिए क्यों कहा ? फिर से संसार में जाने की उसकी इच्छा नहीं है।

श्री रामकृष्ण - उसकी माँ रामलाल के पास बहुत रोई है। इसीलिए मैंने कहा, तीन ही दिन के लिए चले जाओ, एक बार मिलकर फिर चले आना। माता को कष्ट देकर क्या कभी ईश्वर की साधना होती है ? संसार में जाते हुए ज्ञानी को क्या डर है ?

महिमाचरण - (सहास्य)- महाराज, हाजरा को ज्ञान जब हो तब न !

श्री रामकृष्ण (सहास्य) - हाजरा को सब कुछ हो गया है। संसार में थोडा सा मन है, कारण, बच्चे आदि है , और कुछ ऋण है। मामी की सब बीमारी अच्छी हो गयी है, एक नासूर रोग है ! ( महिमाचरण आदि सब हंसते हैं।)

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से
मुख़र्जी - (हाजरा से )- आपने इनके पास से बहुत कुछ सीखा है।

श्री रामकृष्ण ( सहास्य)- नहीं, बचपन से ही इनकी यह अवस्था है । ( सब हंसते हैं ।)

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से


श्री रामकृष्ण -( विजय आदि से) - साधुओं के तीन दर्जे हैं - उत्तम , मध्यम और अधम। जो उत्तम है, वे भोजन की खोज में नहीं फिरते। मध्यम जो है, वे नमोनारायण करके खड़े हो जाते हैं। जो अधम है, वे न देने पर झगडा करते हैं। ( सब हँसे।)

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से
कमरे में आकर श्री रामकृष्ण अपने आसन पर बैठे। जो लोग संकीर्तन कर रहे थे, उन लोगों ने आकर श्री रामकृष्ण को प्रणाम किया। श्री रामकृष्ण उनसे कह रहे हैं- " रूपये के लिए जिस तरह देह से पसीना बहाते हो, उसी तरह उनका नाम लेकर नाच-कूद कर बहाना चाहिए। मेरी इच्छा हुई तुम लोगो के साथ नाचूँ । जाकर देखा मसाला पड़ चुका था- मेथी तक। ( सब हंसते हैं।) तब मैं क्या डालकर उसे सुगन्धित करता ?

- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से
श्री रामकृष्ण - मैं यदु मल्लिक के घर गया था। जाते ही उसने पूछा, गाड़ी का किराया कितना है ? जब मेरे साथ वालों ने कहा तीन रूपये दो आने , तब उसने मुझसे पूछा। उधर उसके एक आदमी ने आड़ में बग्घी वाले से पूछा। उसने बताया, तीन रुपये चार आने। ( सब हंसते हैं।) तब फिर दौड़ा हुआ हमारे पास आया, पूछा, ' किराया क्या पड़ा?'



- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से

मंगलवार, जनवरी 10, 2012

श्री रामकृष्ण - (राम से ) - अब ये बताओ, मेरा हाथ क्यों टूटा ? तुम इसी विषय पर एक लेक्चर दो! ( सब हंसते हैं।)



-रामकृष्ण वचनामृत से
श्री रामकृष्ण - "संन्यासी जितेन्द्रिय होने पर भी लोक-शिक्षा के लिए स्त्रियों के साथ उसे बातचीत न करनी चाहिए। भक्त स्त्री होने पर भी उससे ज्यादा देर बातचीत न करे। संन्यासी की है निर्जला एकादशी। एकादशी और दो तरह की है। एक फल -मूल खाकर रखी जाती है , एक पुडी कचोरी और मालपुए खाकर।" ( सब हंसते हैं।)

"कभी तो ऐसा भी होता है कि उधर पुड़ियाँ उड़ रही है और इधर दूध में रोटियां भी भीग रही है, फिर खायेंगे ! " ( सब हंसते हैं।)

(हंसते हुए )" तुम लोग निर्जला एकादशी न रख सकोगे।"

कृष्ण किशोर को मैंने देखा, एकादशी के दिन पुड़ियाँ और पकवान उड़ा रहे थे। मैंने हृदय से कहा, 'हृदय मेरी भी इच्छा होती है कि मैं भी कृष्ण किशोर की एकादशी रखूं।' ( सब हंसते हैं।)

एक दिन ऐसा ही किया भी। खूब कसकर खाया। परन्तु उसके दूसरे दिन फिर कुछ न खाया गया।" ( सब हंसते हैं।)


-रामकृष्ण वचनामृत से

शुक्रवार, जनवरी 06, 2012

श्री रामकृष्ण-( महिम से ) - मैंने गिरीश से तुम्हारे बारे में बातचीत की थी। वह बहुत गहरा है, तुम सिर्फ घुटने तक हो। अच्छा , देखे तो भला जो मैंने कहा है वह ठीक है या नहीं। मैं चाहता हूँ कि तुम दोनों में बहस हो। पर देखो आपस में समझौता न कर लेना ( सब हंसते हैं।)




-रामकृष्ण वचनामृत से
... इसी समय एक बालक भक्त सारदा आये और श्री रामकृष्ण को प्रणाम किया।

श्री रामकृष्ण (सारदा से) - तू दक्षिणेश्वर क्यों नहीं आता ? मैं जब कलकत्ता आया करता हूँ , तो तू दक्षिणेश्वर क्यों नहीं आता ?

सारदा - मुझे खबर नहीं मिलती।

श्री रामकृष्ण - अब तुझे खबर दूंगा। ( मास्टर से सहास्य) लड़कों की एक फेहरिस्त तो बनाओ। ( मास्टर और भक्त हंसते हैं।)


- रामकृष्ण वचनामृत से
डॉक्टर सरकार - किससे क्या हो जाता है, कुछ कहा नहीं जाता। पाकापाडा के बाबुओं के यहाँ सात साल की एक लड़की बीमार पड़ी। उसे कूकर खांसी आती थी। मैं देखने के लिए गया। बीमारी के कारण का पता मुझे किसी तरह नहीं मिल रहा था। अंत में पता चला, वह गधी भीग गयी थी जिसका दूध वह लड़की पीती थी। ( सब हंसते हैं। )


श्री रामकृष्ण - कहते क्या हो ? इमली के पेड़ के नीचे से मेरी गाड़ी निकल गयी थी, इससे मेरा हाजमा बिगड़ गया था ! ( सब हँसे )


डॉक्टर- (हँसते-हँसते) - जहाज के कप्तान को बड़े जोर से सर-दर्द हो रहा था। डॉक्टरो ने सलाह करके जहाज को दवा ( ब्लिस्टर) लगा दी। ( सब हंसते हैं।)




-श्री रामकृष्ण वचनामृत से
गिरीश - ( सहास्य डॉक्टर से ) - आप तीन - चार घंटे से यहाँ है, रोगियों की चिकित्सा के लिए न जाइएगा ?


डॉक्टर - कहाँ रही डॉक्टरी और कहाँ रहे रोगी ! ऐसे परमहंस से पाला पड़ा है कि मेरा तो सर्वस्व ही स्वाहा हुआ ! ( सब हँसे)


श्री रामकृष्ण - देखो, कर्मनाशा नाम की एक नदी है। उस नदी में डुबकी लगाना एक महा-विपत्ति है । इससे कर्मों का नाश हो जाता है। फिर वह मनुष्य कोई काम नहीं कर सकता। ( डॉक्टर आदि सब हंसते हैं।)



- श्री रामकृष्ण वचनामृत से

गुरुवार, जनवरी 05, 2012

" यदि शांति चाहती हो तो किसी के दोष मत देखना, दोष देखना तो सिर्फ अपने। सारे संसार को अपना बनाना सीखो। कोई पराया नहीं है मेरी बच्ची, यह सारा संसार तुम्हारा अपना है। "

श्री सारदा देवी

मंगलवार, जनवरी 03, 2012

२८.४.१९९५
' क्यों भई ढाई अक्षर वाला पाठ ठीक तरह पढ़ लिया ना ?
हाँ हाँ बिलकुल पढ़ लिया।
' वाह ! अब प्रेम की लताएँ धरती से आकाश तक जा पहुंचेगी। '
' प्रेम ? मैंने तो घृणा का पाठ पढ़ा है.'
'ओह ! यह क्या हो गया। '
दोनों ने ही ढाई अक्षर बोले । एक ने कहा प्रेम, दूसरे ने कहा घृणा। आदमी के मानसिक धरातल पर कब ढाई अक्षर का झांसा देकर प्रेम की जगह घृणा की फसल लहलहाने लगती है ? ....
२५.४.१९९५
' .....बाकी तो जिंदगी की पाठशाला और समय नाम के मास्टरजी ; कब बाज को घोंघा बना दे और कब मोती कोयला हो जाये, कुछ पता नहीं। ...'
२६.३.१९९५
चुप रहा नहीं जाता, कुछ कहा नहीं जाता
जीवन भंवर में सबकी तरह , बहा नहीं जाता।

सोमवार, जनवरी 02, 2012

वृद्धावस्था बाघिन के समान सामने खड़ी दहाड़ रही है, अनेक रोग शत्रु की तरह इस शरीर पर चोटें कर रहे हैं, आयु भी फूटे घड़े से रिसने वाले जल की तरह प्रतिदिन घटती जा रही है; फिर भी मनुष्य ऐसे कर्म करते हैं, जो उनके लिए सर्वथा अहितकारी है। क्या यह बड़े आश्चर्य की बात नहीं है ?

- भृतहरि कृत वैराग्यशतकम