श्री रामकृष्ण - " ...........जिसकी जैसी प्रवृत्ति , जिसका जैसा भाव वह उसे ही लेकर रहता है।"
" किसी धार्मिक मेले में अनेक तरह की मूर्तियाँ पाई जाती है, और वहां अनेक मतों के आदमी जाते हैं। राधा-कृष्ण, हर-पार्वती, सीता-राम, जगह जगह पर भिन्न भिन्न मूर्तियाँ रखी रहती है। और हर एक मूर्ति के पास लोगों की भीड़ होती है। जो लोग वैष्णव है उनकी अधिक संख्या राधा-कृष्ण के पास खड़ी हुई है, जो शाक्त हैं उनकी भीड़ हर-पार्वती के पास लगी है। जो राम भक्त हैं वे सीता-राम की मूर्ति के पास खड़े हुए हैं।
परन्तु जिनका मन किसी देवता की ओर नहीं है, उनकी और बात है। वेश्या अपने आशिक की झाड़ू से खबर ले रही है, ऐसी मूर्ति भी वहां बनाई जाती है। उस तरह के आदमी मुहं फैलाये हुए वहीँ मूर्ति देखते और अपने मित्रों को चिल्लाते हुए उधर ही बुलाते भी हैं, कहते हैं, ' अरे वह सब क्या खाक देखते हो ? इधर आओ जरा, यहाँ तो देखो !' "
सब हंस रहे हैं, गोस्वामी प्रणाम करके बिदा हुए।
- श्रीरामकृष्ण वचनामृत से